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आइये इतिहास संजोएं

इतिहास का लेखा जोखा रखने की सदियों से हमारी परम्परा रही है तो जरूरत भी रही है. आजादी से पहले तक राव भाट जैसी जातियां-उप जातियां हमारे इतिहास को संरक्षित रखने और वंश परम्परा का रेकॉर्ड रखने का दायित्व बखूबी निभाती रही है. इनके पास हर जाति,समाज के पूर्वजों का इतिहास सदियों तक सुरक्षित रहा। यही दस्तावेज तो है जो हमें पूर्वजों की जानकारी उपलब्ध कराते है. समय के बदलाव में इतिहास संरक्षण की प्रक्रिया बदल गई. आज हमारे लिये रोजगार और आवश्यकताओं की पूर्ति पहली प्राथमिकता है. तकनीक और शहरीकरण की दौड़ में हमारी विरासत हमसे बिछुड़ रही है. निःसंदेह हमारा विकास हुआ है, लेकिन हमें संस्कॄति से जुड़ाव भी रखना चाहिये. शहरों में बसने के कारण हमारी पहचान सिर्फ आधार कार्ड और राशन कार्ड तक पर सीमित हो रही है. एकल परिवार समय की मांग हो सकती है,लेकिन हमें अपनी जन्म भूमि से जुड़े रहना चाहिये. यदि हम सिर्फ अपने तक सीमित रहे तो कोई दौराय नहीँ की आने वाली नई पीढ़ी के सामने पारिवारिक और सांस्कॄतिक पहचान का संकट खड़ा हो जाये. हमारी कोशिश है कि आपकी संतान आसमान की ऊँचाईया जरूर छुए,लेकिन उसे ये भी पता रहे कि उसके पूर्वज कौन थे. हमारा यह भी प्रयास है कि नई पीढ़ी में रिश्तों को सहेजने का भाव या चाहत पैदा करें. उम्मीद है हम आपकी भावनाओं को समझते हुए अपने उद्देश्य पर खरा उतरेंगे.बस आपका स्नेह और मार्गदर्शन मिलता रहे. रावजी ऑनलाइन पर आप अपने परिवार का इतिहास संरक्षित करें. आपकी छोटी सी कोशिश युवा पीढ़ी के लिये मददगार साबित होगी.

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Virendra Pal Singh Denok 
Founder 

 

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Yashwant Kanwar 
Co-Founder

 

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  • आपको और आपके बच्चों को पूर्वजों के नाम याद रहें I

  • आप अपने गांव और समाज से परिचित रहें I

  • आप अपनी जाति, गौत्र व् उत्पत्ति से परिचित रहें I

  • आपको अपनों की जन्म तिथि, विवाह तिथि व् पूर्वजों की पुण्य तिथि की सूचना मिले I

  • आपको वैवाहिक संबंध स्थापित करने में सहज सहयोग मिले I

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समय की है मांग
मौजूदा समय में ऐसे प्रयासों की जरूरत है. तभी हम भावी पीढ़ी को विरासत के रूप में कुछ दे पायेंगे. युवाओं के लिये रावजी ऑनलाइन उपयोगी साबित होगी. फाउन्डर को बधाई.

श्री महंत नारायणगिरी महाराज

दुधेश्वर पीठाधीश्वर गाजियाबाद उतरप्रदेश.

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अनूठा प्रयास
हमारी संस्कृति और परम्पराएं समृद्ध रही है. इनका संरक्षण बहुत जरूरी है. हमें इनका पोषण करना चाहिये. रावजी ऑनलाइन को बधाई और शुभकामनायें.

संत रूपमुनि

जैन संत

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समाज को जोडऩे का यह पुनित कार्य

देश में ऐसे हजारों लोग होंगे जिन्हें माइग्रेशन के बाद अपने पूर्वजों की ठीक से जानकारी नहीं है कि वे मूल रूप से कहां के है और उनकी धार्मिक और सामाजिक पहचान क्या थी। शहरीकरण की दौड़ में भी हम अपनी मूल पहचान से दूर हुए हैं।  रावजी ऑनलाइन समाज को जड़ों से जोडऩे का पुनित और बेहतरीन उदाहरण है।

मदन राठौड़

उप मुख्य सचेतक, राजस्थान विधानसभा

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शिक्षा देने के लिए अत्यंत सुन्दर उदाहरण...

" जिस दिन भारत की संतान अपने अतीत की कीर्ति कथाएं भुला देगी उसी दिन उसकी उन्नति का कार्य बंद हो जायेगा I पूर्वजो के अतीत के पुण्य कर्म आने वाली संतान को सुक्रम की शिक्षा देने के लिए अत्यंत सुन्दर उदाहरण हैं I "

स्वामी विवेकानंद

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पुरखों से जुड़े रहें ......

मिट्टी के क्षरण को रोकने के लिए जिस प्रकार वृक्ष लगाना जरूरी है, उसी प्रकार अपने पुरखों से जुड़कर हम स्वयं के क्षरण को रोक सकते है।

साधवी ऋतम्बरा

साधवी

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ऐतिहासिक परंपरा को पुनर्जीवित किया हैं...
मनुष्य अस्तित्व दस्तावेजों के सरंक्षण की श्रेष्ठ ऐतिहासिक परंपरा को पुनर्जीवित किया हैं ..वर्तमान डिज़िटल युग में इस व्यवस्था का भी डिजिटलीकरण बहुत आवश्यक था | रावजी ऑनलाइन पोर्टल का बेहतरीन प्रयास ...!

प्रकाश सिंह राठौड़ " भदरू "

आर.ए.एस अधिकारी (आर.टी.ओ.)

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समय के साथ कुछ सुधार आवश्यक...
कोई भी परंपरा हो उसमे समय के साथ कुछ सुधार आवश्यक हैं तभी वो श्रेष्ठ रह पायेगी अन्यथा वो हावी हो जाती हैं. रावजी ऑनलाइन पोर्टल की व्यवस्था से इस परम्परा में सरलता व् पारदर्शिता आएगी | टीम को सादुवाद् व् शुभकामनाएं ...

नरपत सिंह भाटी

विकास अधिकारी, राजस्थान सरकार

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इस परम्परा से लोगों के बीच प्रेम बढ़ेगा ..

वंशावली लेखन की परम्परा से समाज में आपसी झगड़ों और अलगाव की स्थिति पैदा नहीं होगी। इस पुनीत कार्य से लोगों के बीच प्रेम को बढ़ावा देकर सुदृढ़ भारत की नींव रखी जा सकती है।

 

श्रीमती वसुन्धरा राजे

मुख्यमंत्री राजस्थान

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ये हैं भारत के टॉप 10 किले जो अपने में भारत का इतिहास समेटे हुए हैं

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Jaisalmer Fort
Posted By Raoji Online

जब हम कला की बात करते हैं तो हमारे मन में कई तस्वीरें आती हैं. इस दुनिया में कला के अनगिनत रूप हैं. हांथों से बनाये गये चित्र, कैमरे से खींची गयी तस्वीरें और मिट्टी से बनाई गयी मूर्तियां सब कला के अलग-अलग नमूने हैं. सिर्फ़ ये ही नहीं पुराने ज़माने के राजा-महाराजा और मुग़लिया शासकों के द्वारा बनवाये गये किले भी कला की नायाब निशानियों में आते हैं.किलों की दीवारों पर बने अलग-अलग तरह के डिज़ाइन बेहद खूबसूरत हैं और अपनी कलात्मकता का बखान करते हैं. यह किले अपने समय में घटी रोमांस, शौर्य, वीरता, अपरिहार्य छल और राजनीतिक षड्यंत्रों की गाथा सुनाते हैं. इनमें आप उस समय के होनहार कलाकारों द्वारा बनाई गयी कलाकृतियों को देख सकते हैं. ये किले इंसान द्वारा बनाई गयी वास्तुकला का शानदार नमूना हैं.

इन भव्य संरचनाओं के दीवानों के लिए आज हम लाये हैं भारत के टॉप 10 किलों की एक लिस्ट.

1. लाल किला

बलुआ पत्थर से बनी लाल किले की संरचना दुनिया के सामने भारत को प्रस्तुत करती है. दिल्ली में स्थित लाल किले को भारत का गौरव भी कहा जाता है. इस किले को मुग़लई बादशाह शाहजहां ने 17वीं शताब्दी में बनवाया था. UNESCO द्वारा एक विश्व विरासत स्थल के रूप में अंकित ये लाल ईमारत अपने पूर्व गौरव की गाथा सुनाती है. लाल किले का असली नाम किला-ए-मुबारक था और इसे बनाने में लगभग 10 साल लगे थे. किले के अंदर सार्वजनिक और निजी हॉल, मस्जिदें और बाग हैं.

2. अमेर का किला

अमेर का किला अरावली पहाड़ी की एक शांत पृष्ठभूमि में स्थित है. हिंदू, राजपूत और मुग़ल स्थापत्य शैली के मिश्रण से बना ये किला अपनी भव्यता के लिए मशहूर है. राजा मानसिंह प्रथम द्वारा निर्मित इस खूबसूरत किले में संगमरमर, कांच, धातु और लकड़ी की नक्काशी देखी जा सकती है.

3. आगरा किला

वैसे तो आगरा अपने प्रतिष्ठित ताजमहल के लिए प्रसिद्ध है. लेकिन यहां कई अन्य वास्तुकला के चमत्कार भी मौजूद हैं, जो आगरा को भारत की सांस्कृतिक यात्रा के लिए सबसे अच्छे गंतव्य स्थानों में से एक बनाते हैं. आगरा के किले की ये बड़ी-सी लाल इमारत भारत में मुग़ल वंश के उत्थान और पतन की कहानी बयां करती है. शाहजहां ने अपनी ज़िंदगी के अंतिम साल इसी किले के एक ऊंचे महल में गुज़ारे थे, जहां से ताजमहल दिखाई देता था.

4. जैसलमेर किला

राजस्थान के हर शहर का हर कोना शाही लोगों के रहन-सहन की कहानी बयां करता है और जैसलमेर भी इन बातों में पीछे नहीं है. Arabian Night की दंतकथाओं जैसे दिखने वाले राजस्थान के इस शहर में जैसलमेर किला ऊंची चट्टान पर स्थित है. पीले बलुआ पत्थर से बना ये किला सूरज की किरणें पड़ने पर किसी स्वर्ण मुकुट की तरह चमकता हैं. इस किले की सादगी इसकी वास्तुकला और सजावट में देखी जा सकती है. यह दुनिया के सबसे बड़े किले के रूप में भी जाना जाता है.

5. दौलताबाद किला

दौलताबाद का किला अपने शहर के इतिहास के रूप में सबसे अच्छा दस्तावेज़ है. इस किले से आप इसके चारों तरफ फैली हरियाली को देख सकते हैं. यह जगह निश्चित रूप से फोटोग्राफर्स के लिए स्वर्ग है. अपने Vintage Look की वजह से ये किला पर्यटकों को कभी निराश नहीं करता. इस किले पर कई राजवंशों ने राज किया है और आज भी उनके अवशेष औरंगाबाद के इस किले में पाए जा सकते हैं.

6. गोलकोंडा किला

गोलकोंडा किला हैदराबाद से सिर्फ़ 11 किलोमीटर दूर स्थित है. यह किला दिल्ली या आगरा के किले जितना प्रसिद्ध तो नहीं है लेकिन भारत के Cultural Tour पर जाने के लिए ये किला सबसे बेहतर है. इसे असल में काकतीय राजवंश ने बनाया था, जिस पर बाद में इब्राहिम कुली कुतुब शाह वली ने राज किया. कुतुब शाह के राज में इस किले का कई बार पुनर्निर्माण कराया गया था. शहर की भाग-दौड़ से दूर ये किला एक शांत चट्टान पर खड़ा अपने शाही समय की गाथा गा रहा है.

7. जूनागढ़ किला

ये किला राजस्थान के बीकानेर के केंद्र में स्थित है. कला दीर्घाओं, गलियारों के एक बेड़े के साथ यह एक बहुत ही विशालकाय संरचना है. यह भारत के अच्छी तरह से संरक्षित किलों में से एक है. इसकी आंतरिक और बाह्य दीवारों और खम्भों पर रंग-बिरंगी कलाकृतियां बनी हुई हैं. यह किला इतना विशाल और आकर्षक है कि भारतीय डाक सेवा ने इस किले की तस्वीर वाला डाक टिकट भी जारी किया है.

8. ग्वालियर का किला

एक बार मुग़ल बादशाह बाबर ने ग्वालियर के किले को "हिन्द के किलों के हार में मोती की तरह" कहकर वर्णित किया था. इस किले से आप ग्वालियर के मनोरम दृश्यों को देख सकते हैं. ग्वालियर के किले को पहली बार शून्य (Zero) का इस्तेमाल करने की वजह से मानव सभ्यता में एक अनोखा स्थान प्राप्त है. आप इस किले के कमरों और हॉल में रंगों को ख़ूबसूरती से बिखरा हुआ देख सकते हैं. 1589 में बने इस किले पर बीकानेर के लगभग 20 शासकों ने 1920 तक राज किया था.

9. झांसी किला

1613 में, ओरछा (Orcha) के राजा द्वारा निर्मित ये किला झांसी में बंगरा (Bangra) नामक पहाड़ी पर स्थित है. इस किले में 10 दरवाज़े हैं - खान्देरो दरवाज़ा, दतिया दरवाज़ा, उन्नाव दरवाज़ा, झरना दरवाज़ा, लक्ष्मी दरवाज़ा, सागर दरवाज़ा, ओरछा दरवाज़ा, सीनयर दरवाज़ा और चांद दरवाज़ा. ये किला आज भी झांसी की बहादुर रानी, रानी लक्ष्मी बाई के जीवन की कहानी बयां करता है.

10. चित्तौड़गढ़ किला

अगर चित्तौड़गढ़ राजस्थान की शान है, तो चित्तोड़गढ़ का किला ज़रूर उसका आइकॉन है. यह किला उस समय का साक्षी है, जब शाही लोग दुश्मन के सामने झुकने के बजाय मर जाना पसंद करते थे. आज भी आप इस किले में जा कर रानी पद्मिनी की वीरता के बारे में लोक गीत सुन सकते हैं. इस किले के अंदर कई महल, मंदिर, निजी और सार्वजानिक हॉल हैं, जो हर साल लाखों यात्रियों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं.

अगर आपने ये किले नहीं देखें हैं, तो जनाब ज़्यादा सोचिए मत. जाइए और इन किलों को देखिए. आपके मन और आंखों दोनों को शांति मिलेगी.

 

 

sourch  : Gazabpost

भारत का इतिहास सुनहरा ही नहीं ताकतवर भी था, तभी तो दुनिया की सबसे ख़तरनाक तोपें भारत में ही हैं

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Posted By Raoji Online

तोप ज़मानों से जंग का हिस्सा रही हैं. समय के साथ इसके आकार और ताकत में परिवर्तन हुआ है. वर्तमान में इस्तेमाल होने वाली हर तोप कहीं न कहीं इतिहास की तोपों से मिलती-जुलती हैं. अगर हम इतिहास में झांके तो पता चलता है कि तोप की शुरुआत पहले पत्थर के गोले फ़ेकने से शुरू हुई, जो वक़्त के साथ लोहे के गोले और फिर बारुद भरे गोले फ़ेकने तक जा पहुंची.

सन 1526 में तोपों का सबसे सफ़ल प्रयोग बाबर ने इब्राहिम लोदी के खिलाफ़ किया गया था. बाबर की सेना ने सिपाहियों की संख्या कम होने के बावजूद तोप की सहायता से लोदी को हरा दिया था. वहीं 1528 में भी बाबर ने राणा सांगा को अपनी तोप की ताकत से ही हराया था.

उस वक़्त भी तोपों के डिज़ाइन और ताकत में लोग बदलाव करते रहते थे. लेकिन पहली तोप जिसे आज के युग की तोप की शुरुआत कहा जा सकता है, वो थी मलिक-ए-मैदान, जिसका मतलब होता है जंग के मैदान का राजा. इसे 1549 में मोहम्मद-बिन-हुसैन ने बनाया था. 700 mm मारक क्षमता वाली इस तोप से पहली बार लोहे का गोला दागा गया था. ये तोप खुद लोहे की बनी थी.

दूसरी तोप का ज़िक्र मिलता है सन 1620 से, उस वक़्त बनाई गई तोप का ताल्लुक नायक शासन काल से दिखता है. Thanjavur शहर की रक्षा के लिए इसे मुख्य द्वार पर लगाया गया था.

280 MM मारक क्षमता वाली ये तोप जयपुर सीमा की रक्षा करती थी. राजा जय सिंह ने इसे सन 1720 में बनवाया था. इस तोप को शहर द्वार पर लाने के लिए कई हाथियों का सहारा लिया गया था. इस तोप से 50 किलो का गोला दुश्मन पर दागा जाता था, जिसमें बारूद भरा होता था, इसके वार से बड़ी से बड़ी सेना डर कर पीछे हटने को मजबूर हो जाती थी.

दाला मरदाना नाम से जाने जानी वाली ये तोप 286 MM की मारक क्षमता रखती थी. 1565 में इस तोप को बनवाया गया था. इस तोप का ताल्लुक बिसनपुर से है. महाराजा बीर हमबीर के शासन काल में इस तोप को बनाया गया था. दाला का मतलब होता है दुश्मन और मरदाना का मतलब होता है कातिल. इस तोप की ताकत के कारण इसे दुश्मन का कातिल कहा गया.

जहान कोसना नाम की ये पांचवी तोप 286 MM मारक क्षमता रखती थी. ये तोप पश्चिम बंगाल की सीमा की सुरक्षा के लिए तैनात थी. लेकिन शाहजहां के शासन काल में इस तोप का नाम बदल कर ढाका रख दिया था. इस तोप के गोले 8 अलग-अलग पदार्थों से मिला कर बनाए जाते थे.

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“राजपूताना राइफल्स” की ऐसी 17 बातें जिन्हें जानकर आपका सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा

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Posted By Virendra Pal Singh Denok

1. ‘राजपूताना राइफल्स’ इंडियन आर्मी का सबसे पुराना और सम्मानित राइफल रेजिमेंट है. इसे 1921 में ब्रिटिश इंडियन आर्मी के तौर पर विकसित किया गया था.

 

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2. सन् 1945 से पहले इसे 6 राजपूताना राइफल्स के तौर पर जाना जाता था क्योंकि, इसे तब की ब्रिटिश इंडियन आर्मी के 6 रेजिमेंट्स के विलय के बाद बनाया गया था.

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3. राजपूताना राइफल्स को मुख्यत: पाकिस्तान के साथ युद्ध के लिए जाना जाता है.

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4. 1953-1954 में वे कोरिया में चल रहे संयुक्त राष्ट्र संरक्षक सेना का हिस्सा थे. साथ ही वे 1962 में कौंगो में चले संयुक्त राष्ट्र मिशन का भी हिस्सा थे.

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5. राजपूताना राइफल्स की स्थापना 1775 में की गई थी, जब तात्कालिक ईस्ट इंडिया कम्पनी ने राजपूत लड़ाकों की क्षमता को देखते हुए उन्हें अपने मिशन में भरती कर लिया.

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6. तब की बनी स्थानीय यूनिट को 5वीं बटालियन बंबई सिपाही का नाम दिया गया था. इसे 1778 में 9वीं बटालियन बंबई सिपाही के तौर पर रि-डिजाइन किया गया था. रेजिमेंट को 1921 में फ़ाइनल शेप देने से पहले 5बार रि-डिजाइन किया गया.

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7. 2 राजपूताना राइफल्स वहां लड़ने वाली 7 आर्मी यूनिट्स में से पहली यूनिट थी, जिसे 1999 में हुए कारगिल युद्ध में बहादुरी के लिए आधिकारिक तौर पर सम्मान पत्र से नवाज़ा गया था.

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8. राजपूताना राइफल्स का आदर्श और सिद्धांत वाक्य “वीर भोग्या वसुंधरा” है. जिसका अर्थ है कि ‘केवल वीर और शक्तिशाली लोग ही इस धरती का उपभोग कर सकते हैं’. अब और कुछ बाकी है क्या?

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9. राजपूताना राइफल्स का युद्धघोष है... “राजा रामचन्द्र की जय”

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10. राजपूतों के अलावा, राजपूताना राइफल्स में जाट, अहीर, गुज्जर और मुस्लिमों की भी अच्छी-ख़ासी संख्या है.

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11. प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान राजपूताना राइफल्स के लगभग 30,000 सैनिकों ने अपनी जान गंवा दी.

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12. मध्यकालीन राजपूतों का हथियार कटार और बिगुल राजपूत रेजिमेंट का प्रतीक चिन्ह है.

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13. राजपूत रेजिमेंट और राजपूताना राइफल्स दो अलग-अलग आर्मी यूनिट हैं.

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14. दिल्ली में स्थित राजपूताना म्यूजियम राजपूताना राइफल्स के समृद्ध इतिहास की बेहतरीन झलक है. यह पूरे भारत के बेहतरीन सेना म्यूजियमों में से एक है.

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15. 6th बटालियन राजपूताना राइफल्स के कम्पनी हवलदार मेजर पीरू सिंह शेखावत को 1948 में हुए भारत-पाक युद्ध के बाद, मरणोपरांत सेना में अदम्य साहस के लिए दिए जाने वाले तमगे “परम वीर चक्र” से नवाज़ा गया.

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16. राजपूताना राइफल्स को आज़ादी पूर्व 6 विक्टोरिया क्रॉस से नवाज़ा गया है. जो अदम्य साहस, इच्छाशक्ति और अभूतपूर्व सेवाभाव का परिचायक है.

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17. राजपूताना राइफल्स के अधिकतर मेंबरान अपनी विशेष शैली की मूछों के लिए पूरी दुनिया में जाने जाते हैं.

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अब तक आपको इतना तो समझ में आ ही गया होगा कि पूरी दुनिया की फौजें और ख़ास तौर पर पाकिस्तान और चीन की फौज “राजपूताना राइफल्स” से इतना ख़ौफ क्यों खाती हैं.

 

राजस्थान का अत्यंत विशिष्ट त्योहार गणगौर पूजन कब और क्यों...?

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Posted By Yashwant Kanwar Bhati

गणगौर एक त्योहार है जो चैत्र शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। होली के दूसरे दिन (चैत्र कृष्ण प्रतिपदा) से जो नवविवाहिताएँ प्रतिदिन गणगौर पूजती हैं, वे चैत्र शुक्ल द्वितीया के दिन किसी नदी, तालाब या सरोवर पर जाकर अपनी पूजी हुई गणगौरों को पानी पिलाती हैं और दूसरे दिन सायंकाल के समय उनका विसर्जन कर देती हैं। यह व्रत विवाहिता लड़कियों के लिए पति का अनुराग उत्पन्न कराने वाला और कुमारियों को उत्तम पति देने वाला है। इससे सुहागिनों का सुहाग अखंड रहता है।

गणगौर पूजन कब और क्यों :

 

नवरात्र के तीसरे दिन यानि कि चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तीज को गणगौर माता (माँ पार्वती) की पूजा की जाती है। पार्वती के अवतार के रूप में गणगौर माता व भगवान शंकर के अवतार के रूप में ईशर जी की पूजा की जाती है। प्राचीन समय में पार्वती ने शंकर भगवान को पति (वर) रूप में पाने के लिए व्रत और तपस्या की। शंकर भगवान तपस्या से प्रसन्न हो गए और वरदान माँगने के लिए कहा। पार्वती ने उन्हें ही वर के रूप में पाने की अभिलाषा की। पार्वती की मनोकामना पूरी हुई और पार्वती जी की शिव जी से शादी हो गयी। तभी से कुंवारी लड़कियां इच्छित वर पाने के लिए ईशर और गणगौर की पूजा करती है। सुहागिन स्त्री पति की लम्बी आयु के लिए यह पूजा करती है। गणगौर पूजा चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि से आरम्भ की जाती है। सोलह दिन तक सुबह जल्दी उठ कर बगीचे में जाती हैं, दूब व फूल चुन कर लाती है। दूब लेकर घर आती है उस दूब से दूध के छींटे मिट्टी की बनी हुई गणगौर माता को देती है। थाली में दही पानी सुपारी और चांदी का छल्ला आदि सामग्री से गणगौर माता की पूजा की जाती है।

आठवें दिन ईशर जी पत्नी (गणगौर) के साथ अपनी ससुराल आते हैं। उस दिन सभी लड़कियां कुम्हार के यहाँ जाती हैं और वहाँ से मिट्टी के बर्तन और गणगौर की मूर्ति बनाने के लिए मिट्टी लेकर आती है। उस मिट्टी से ईशर जी, गणगौर माता, मालिन आदि की छोटी छोटी मूर्तियाँ बनाती हैं। जहाँ पूजा की जाती है उस स्थान को गणगौर का पीहर और जहाँ विसर्जन किया जाता है वह स्थान ससुराल माना जाता है।

राजस्थान का अत्यंत विशिष्ट त्योहार:

 

राजस्थान का तो यह अत्यंत विशिष्ट त्योहार है। इस दिन भगवान शिव ने पार्वती को तथा पार्वती ने समस्त स्त्री समाज को सौभाग्य का वरदान दिया था। गणगौर माता की पूरे राजस्थान में पूजा की जाती है। राजस्थान से लगे ब्रज के सीमावर्ती स्थानों पर भी यह त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है। चैत्र मास की तीज को गणगौर माता को चूरमे का भोग लगाया जाता है। दोपहर बाद गणगौर माता को ससुराल विदा किया जाता है, यानि कि विसर्जित किया जाता है। विसर्जन का स्थान गाँव का कुआँ या तालाब होता है। कुछ स्त्रियाँ जो विवाहित होती हैं वो यदि इस व्रत की पालना करने से निवृति चाहती हैं वो इसका अजूणा करती है (उद्यापन करती हैं) जिसमें सोलह सुहागन स्त्रियों को समस्त सोलह शृंगार की वस्तुएं देकर भोजन करवाती हैं। इस दिन भगवान शिव ने पार्वती जी को तथा पार्वती जी ने समस्त स्त्री समाज को सौभाग्य का वरदान दिया था। सुहागिनें व्रत धारण से पहले रेणुका (मिट्टी) की गौरी की स्थापना करती है एवं उनका पूजन किया जाता है। इसके पश्चात गौरी जी की कथा कही जाती है।कथा के बाद गौरी जी पर चढ़ाए हुए सिन्दूर से स्त्रियाँ अपनी माँग भरती हैं। इसके पश्चात केवल एक बार भोजन करके व्रत का पारण किया जाता है। गणगौर का प्रसाद पुरुषों के लिए वर्जित है।

उत्सव और अनुष्ठान :

 

गौरी पूजन का यह त्योहार भारत के सभी प्रांतों में थोड़े-बहुत नाम भेद से पूर्ण धूमधाम के साथ मनाया जाता हैं। इस दिन स्त्रियां सुंदर वस्त्र औ आभूषण धारण करती हैं। इस दिन सुहागिनें दोपहर तक व्रत रखती हैं। व्रत धारण करने से पूर्व रेणुका गौरी की स्थापना करती हैं। इसके लिए घर के किसी कमरे में एक पवित्र स्थान पर चौबीस अंगुल चौड़ी और चौबीस अंगुल लम्बी वर्गाकार वेदी बनाकर हल्दीचंदन, कपूर, केसर आदि से उस पर चौक पूरा जाता है। फिर उस पर बालू से गौरी अर्थात पार्वती बनाकर (स्थापना करके) इस स्थापना पर सुहाग की वस्तुएं- कांच की चूड़ियाँ, महावर, सिन्दूर, रोली, मेंहदीटीकाबिंदी, कंघा, शीशा, काजल आदि चढ़ाया जाता है। चंदन, अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से गौरी का विधिपूर्वक पूजन करके सुहाग की इस सामग्री का अर्पण किया जाता है। फिर भोग लगाने के बाद गौरी जी की कथा कही जाती है। कथा के बाद गौरीजी पर चढ़ाए हुए सिन्दूर से महिलाएं अपनी मांग भरती हैं। गौरीजी का पूजन दोपहर को होता है। इसके पश्चात केवल एक बार भोजन करके व्रत का पारण किया जाता है। गणगौर का प्रसाद पुरुषों के लिए निषिद्ध है। गणगौर पर विशेष रूप से मैदा के गुने बनाए जाते हैं। लड़की की शादी के बाद लड़की पहली बार गणगौर अपने मायके में मनाती है और इन गुनों तथा सास के कपड़ो का बायना निकालकर ससुराल में भेजती है। यह विवाह के प्रथम वर्ष में ही होता है, बाद में प्रतिवर्ष गणगौर लड़की अपनी ससुराल में ही मनाती है। ससुराल में भी वह गणगौर का उद्यापन करती है और अपनी सास को बायना, कपड़े तथा सुहाग का सारा सामान देती है। साथ ही सोलह सुहागिन स्त्रियों को भोजन कराकर प्रत्येक को सम्पूर्ण शृंगार की वस्तुएं और दक्षिण दी जाती है। गणगौर पूजन के समय स्त्रियाँ गौरीजी की कथा भी कहती हैं।

मस्ती का पर्व:

 

होली के दूसरे दिन से ही गणगौर का त्योहार आरंभ हो जाता है जो पूरे सोलह दिन तक लगातार चलता रहता है। गणगौर के त्योहार को उमंग, उत्साह और जोश से मनाया जाता है। यह उत्सव मस्ती का पर्व है। इसमें कन्याएँ और विवाहित स्त्रियाँ मिट्टी के ईशर और गौर बनाती है। और उनको सुन्दर पोशाक पहनाती है और उनका शृंगार करती हैं। स्त्रियाँ और कन्याएँ भी इस दिन गहने और कपड़ों से सजी-धजी रहती हैं। और गणगौर के दिन कुँआरी कन्याएँ एक खेल भी खेलती है जिसमें एक लड़की दूल्हा और दूसरी दूल्हन बनती हैं। जिन्हें वे ईशर और गौर कहते हैं और उनके साथ सखियाँ गीत गाती हुई उन दोनों को लेकर अपने घर से निकलती है और सब मिलकर एक बगीचे पर जाती है वहाँ पीपल के पेड़ के जो इसर और गौर बने होते है वो दोनों फेरे लेते हैं। जब फेरे पूरे हो जाते है तब ये सब नाचती और गाती है। उसके बाद ये घर जाकर उनका पूजन करती हैं, और भोग लगाती हैं और शाम को उन्हें पानी पिलाती हैं। अगले दिन वे उन मिट्टी के इसर और गौर को ले जाकर किसी भी नदी में उनका विसर्जन कर देती हैं।

जोधपुर का मेला :

 

जोधपुर में लोटियों का मेला लगता है। वस्त्र और आभूषणों से सजी-धजी, कलापूर्ण लोटियों की मीनार को सिर पर रखे, हज़ारों की संख्या में गाती हुई नारियों के स्वर से जोधपुर का पूरा बाज़ार गूँज उठता है। राजघरानों में रानियाँ और राजकुमारियाँ प्रतिदिन गवर की पूजा करती हैं। चित्रकार पूजन के स्थान पर दीवार पर ईसर और गवरी के भव्य चित्र अंकित कर देता है। केले के पेड़ के पास ईसर और गवरी चौपड़ खेलते हुए अंकित किए जाते हैं। ईसर के सामने गवरी हाथ जोड़े बैठी रहती हैं। ईसरजी काली दाढ़ी और राजसी पोशाक में तेजस्वी पुरुष के रूप में अंकित किए जाते हैं। मिट्टी की पिंडियों की पूजा कर दीवार पर गवरी के चित्र के नीचे सोलह कुंकुम और काजल की बिंदिया लगाकर हरी दूब से पूजती हैं। साथ ही इच्छा प्राप्ति के गीत गाती हैं। एक बुजुर्ग औरत फिर पाँच कहानी सुनाती है। ये होती हैं शंकर-पार्वती के प्रेम की, दाम्पत्य जीवन की मधुर झलकियों की। गणगौर माता की पूरे राजस्थान में जगह जगह सवारी निकाली जाती है जिसमें ईशरदास जीव गणगौर माता की आदम क़द मू्र्तियाँ होती है। उदयपुर की धींगा, बीकानेर की चांदमल गणगौर प्रसिद्ध हैं। राजस्थानी में कहावत भी है तीज तींवारा बावड़ी ले डूबी गणगौर अर्थ है कि सावन की तीज से त्योहारों का आगमन शुरू हो जाता है और गणगौर के विसर्जन के साथ ही त्योहारों पर चार महीने का विराम आ जाता है।

कथा :

 

भगवान शंकर तथा पार्वती जी नारद जी के साथ भ्रमण को निकले। चलते-चलते वे चैत्र शुक्ल तृतीया के दिन एक गाँव में पहुँच गए। उनके आगमन का समाचार सुनकर गाँव की श्रेष्ठ कुलीन स्त्रियाँ उनके स्वागत के लिए स्वादिष्ट भोजन बनाने लगीं। भोजन बनाते-बनाते उन्हें काफ़ी विलंब हो गया किंतु साधारण कुल की स्त्रियाँ श्रेष्ठ कुल की स्त्रियों से पहले ही थालियों में हल्दी तथा अक्षत लेकर पूजन हेतु पहुँच गईं। पार्वती जी ने उनके पूजा भाव को स्वीकार करके सारा सुहाग रस उन पर छिड़क दिया। वे अटल सुहाग प्राप्ति का वरदान पाकर लौटीं। बाद में उच्च कुल की स्त्रियाँ भांति भांति के पकवान लेकर गौरी जी और शंकर जी की पूजा करने पहुँचीं। उन्हें देखकर भगवान शंकर ने पार्वती जी से कहा, 'तुमने सारा सुहाग रस तो साधारण कुल की स्त्रियों को ही दे दिया। अब इन्हें क्या दोगी?' पार्वत जी ने उत्तर दिया, 'प्राणनाथ, आप इसकी चिंता मत कीजिए। उन स्त्रियों को मैंने केवल ऊपरी पदार्थों से बना रस दिया है। परंतु मैं इन उच्च कुल की स्त्रियों को अपनी उँगली चीरकर अपने रक्त का सुहागरस दूँगी। यह सुहागरस जिसके भाग्य में पड़ेगा, वह तन-मन से मुझ जैसी सौभाग्यशालिनी हो जाएगी।' जब स्त्रियों ने पूजन समाप्त कर दिया, तब पार्वती जी ने अपनी उँगली चीरकर उन पर छिड़क दिया, जिस जिस पर जैसा छींटा पड़ा, उसने वैसा ही सुहाग पा लिया। अखंड सौभाग्य के लिए प्राचीनकाल से ही स्त्रियाँ इस व्रत को करती आ रही हैं। इसके बाद भगवान शिव की आज्ञा से पार्वती जी ने नदी तट पर स्नान किया और बालू के महादेव बनाकर उनका पूजन करने लगीं। पूजन के बाद बालू के ही पकवान बनाकर शिवजी को भोग लगाया। इसके बाद प्रदक्षिणा करके, नदी तट की मिट्टी के माथे पर टीका लगाकर, बालू के दो कणों का प्रसाद पाया और शिव जी के पास वापस लौट आईं। इस सब पूजन आदि में पार्वती जी को नदी किनारे बहुत देर हो गई थी। अत: महादेव जी ने उनसे देरी से आने का कारण पूछा। इस पर पार्वती जी ने कहा- 'वहाँ मेरे भाई-भावज आदि मायके वाले मिल गए थे, उन्हीं से बातें करने में देरी हो गई।' परन्तु भगवान तो आख़िर भगवान थे। वे शायद कुछ और ही लीला रचना चाहते थे। अत: उन्होंने पूछा- 'तुमने पूजन करके किस चीज़ का भोग लगाया और क्या प्रसाद पाया?' पार्वती जी ने उत्तर दिया- 'मेरी भावज ने मुझे दूध-भात खिलाया। उसे ही खाकर मैं सीधी यहाँ चली आ रही हूँ।' यह सुनकर शिव जी भी दूध-भात खाने के लालच में नदी-तट की ओर चल पड़े। पार्वती जी दुविधा में पड़ गईं। उन्होंने सोचा कि अब सारी पोल खुल जाएगी। अत: उन्होंने मौन-भाव से शिव जी का ध्यान करके प्रार्थना की, 'हे प्रभु! यदि मैं आपकी अनन्य दासी हूँ तो आप ही इस समय मेरी लाज रखिए।' इस प्रकार प्रार्थना करते हुए पार्वती जी भी शंकर जी के पीछे-पीछे चलने लगीं। अभी वे कुछ ही दूर चले थे कि उन्हें नदी के तट पर एक सुंदर माया महल दिखाई दिया। जब वे उस महल के भीतर पहुँचे तो वहाँ देखते हैं कि शिव जी के साले और सलहज आदि सपरिवार मौजूद हैं। उन्होंने शंकर-पार्वती का बड़े प्रेम से स्वागत किया। वे दो दिन तक वहाँ रहे और उनकी खूब मेहमानदारी होती रही। तीसरे दिन जब पार्वती जी ने शंकर जी से चलने के लिए कहा तो वे तैयार न हुए। वे अभी और रुकना चाहते थे। पार्वती जी रूठकर अकेली ही चल दीं। तब मजबूर होकर शंकर जी को पार्वती के साथ चलना पड़ा। नारद जी भी साथ में चल दिए। तीनों चलते-चलते बहुत दूर निकल गए। सायंकाल होने के कारण भगवान भास्कर अपने धाम को पधार रहे थे। तब शिव जी अचानक पार्वती से बोले- 'मैं तुम्हारे मायके में अपनी माला भूल आया हूँ।' पार्वती जी बोलीं -'ठीक है, मैं ले आती हूँ।' किंतु शिव जी ने उन्हें जाने की आज्ञा नहीं दी। इस कार्य के लिए उन्होंने ब्रह्मा पुत्र नारद जी को वहाँ भेज दिया। नारद जी ने वहाँ जाकर देखा तो उन्हें महल का नामोनिशान तक न दिखा। वहाँ तो दूर-दूर तक घोर जंगल ही जंगल था। इस अंधकारपूर्ण डरावने वातावरण को देख नारद जी बहुत ही आश्चर्यचकित हुए। नारद जी वहाँ भटकने लगे और सोचने लगे कि कहीं वह किसी ग़लत स्थान पर तो नहीं आ गए? सहसा बिजली चमकी और नारद जी को माला एक पेड़ पर टंगी हुई दिखाई दी। नारद जी ने माला उतार ली और उसे लेकर भयतुर अवस्था में शीघ्र ही शिव जी के पास आए और शिव जी को अपनी विपत्ति का विवरण कह सुनाया। प्रसंग को सुनकर शिव जी ने हंसते हुए कहा- 'हे मुनि! आपने जो कुछ दृश्य देखा वह पार्वती की अनोखी माया है। वे अपने पार्थिव पूजन की बात को आपसे गुप्त रखना चाहती थीं, इसलिए उन्होंने झूठ बोला था। फिर उस को सत्य सिद्ध करने के लिए उन्होंने अपने पतिव्रत धर्म की शक्ति से माया महल की रचना की। अत: सचाई को उभारने के लिए ही मैंने भी माला लाने के लिए तुम्हें दुबारा उस स्थान पर भेजा था।' इस पर पार्वतीजी बोलीं- 'मैं किस योग्य हूँ।' तब नारद जी ने सिर झुकाकर कहा- 'माता! आप पतिव्रताओं में सर्वश्रेष्ठ हैं। आप सौभाग्यवती आदिशक्ति हैं। यह सब आपके पतिव्रत धर्म का ही प्रभाव है। संसार की स्त्रियाँ आपके नाम का स्मरण करने मात्र से ही अटल सौभाग्य प्राप्त कर सकती हैं और समस्त सिद्धियों को बना तथा मिटा सकती हैं। तब आपके लिए यह कर्म कौन-सी बड़ी बात है? हे माता! गोपनीय पूजन अधिक शक्तिशाली तथा आर्थक होता है। जहाँ तक इनके पतिव्रत प्रभाव से उत्पन्न घटना को छिपाने का सवाल है। वह भी उचित ही जान पड़ती है क्योंकि पूजा छिपाकर ही करनी चाहिए। आपकी भावना तथा चमत्कारपूर्ण शक्ति को देखकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई है। मेरा यह आशीर्वचन है- 'जो स्त्रियाँ इस तरह गुप्त रूप से पति का पूजन करके मंगल कामना करेंगी उन्हें महादेव जी की कृपा से दीर्घायु पति का संसर्ग मिलेगा तथा उसकी समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति होगी। फिर आज के दिन आपकी भक्तिभाव से पूजा-आराधना करने वाली स्त्रियों को अटल सौभाग्य प्राप्त होगा ही।'यह कहकर नारद जी तो प्रणाम करके देवलोक चले गए और शिव जी-पार्वती जी कैलाश की ओर चल पड़े। चूंकि पार्वती जी ने इस व्रत को छिपाकर किया था, उसी परम्परा के अनुसार आज भी स्त्रियाँ इस व्रत को पुरुषों से छिपाकर करती हैं। यही कारण है कि अखण्ड सौभाग्य के लिए प्राचीन काल से ही स्त्रियाँ इस व्रत को करती आ रही हैं।

 

राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान राष्ट्रीय संवत विक्रम संवत

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Posted By Raoji Online

विक्रम संवत अत्यन्त प्राचीन संवत है। साथ ही ये गणित की दृष्टि से अत्यन्त सुगम और सर्वथा ठीक हिसाब रखकर निश्चित किये गये है। किसी नवीन 'संवत' को चलाने की शास्त्रीय विधि यह है कि जिस नरेश को अपना संवत चलाना हो, उसे संवत चलाने के दिन से पूर्व कम-से-कम अपने पूरे राज्य में जितने भी लोग किसी के ऋणी हों, उनका ऋण अपनी ओर से चुका देना चाहिये। 'विक्रम संवत' का प्रणेता सम्राट विक्रमादित्य को माना जाता है। कालिदास इस महाराजा के एक रत्न माने जाते हैं। कहना नहीं होगा कि भारत के बाहर इस नियम का कहीं पालन नहीं हुआ। भारत में भी महापुरुषों के संवत उनके अनुयायियों ने श्रद्धावश ही चलाये; लेकिन भारत का सर्वमान्य संवत 'विक्रम संवत' ही है और महाराज विक्रमादित्य ने देश के सम्पूर्ण ऋण को, चाहे वह जिस व्यक्ति का रहा हो, स्वयं देकर इसे चलाया। इस संवत के महीनों के नाम विदेशी संवतों की भाँति देवता, मनुष्य या संख्यावाचक कृत्रिम नाम नहीं हैं। यही बात तिथि तथा अंश (दिनांक) के सम्बन्ध में भी है, वे भी सूर्य-चन्द्र की गति पर आश्रित हैं। सारांश यह कि यह संवत अपने अंग-उपांगों के साथ पूर्णत: वैज्ञानिक सत्य पर स्थित है। 

शास्त्रों व शिलालेखों में उल्लेख :

 

'विक्रम संवत' के उद्भव एवं प्रयोग के विषय में कुछ कहना कठिन है। यही बात 'शक संवत' के विषय में भी है। किसी विक्रमादित्य राजा के विषय में, जो ई. पू. 57 में था, सन्देह प्रकट किए गए हैं। इस संवत का आरम्भ गुजरात में कार्तिकशुक्ल प्रतिपदा से (नवम्बर, ई. पू. 58) और उत्तरी भारत में चैत्र कृष्ण प्रतिपदा (अप्रैल, ई. पू. 58) से माना जाता है। बीता हुआ विक्रम वर्ष ईस्वी सन+57 के बराबर है। कुछ आरम्भिक शिलालेखों में ये वर्ष कृत के नाम से आये हैं[1]

विद्वान मतभेद :

विक्रम संवत के प्रारम्भ के विषय में भी विद्वानों में मतभेद हैं। कुछ लोग ईसवी सन 78 और कुछ लोग ईसवी सन 544 में इसका प्रारम्भ मानते हैं। फ़ारसी ग्रंथ 'कलितौ दिमनः' में पंचतंत्र का एक पद्य 'शशिदिवाकर योर्ग्रहपीडनम्श' का भाव उद्धृत है। विद्वानों ने सामान्यतः 'कृत संवत' को 'विक्रम संवत' का पूर्ववर्ती माना है। किन्तु 'कृत' शब्द के प्रयोग की व्याख्या सन्तोषजनक नहीं की जा सकी है। कुछ शिलालेखों में मावल-गण का संवत उल्लिखित है, जैसे- नरवर्मा का मन्दसौर शिलालेख। 'कृत' एवं 'मालव' संवत एक ही कहे गए हैं, क्योंकि दोनों पूर्वी राजस्थान एवं पश्चिमी मालवा में प्रयोग में लाये गये हैं। कृत के 282 एवं 295 वर्ष तो मिलते हैं, किन्तु मालव संवत के इतने प्राचीन शिलालेख नहीं मिलते। यह भी सम्भव है कि कृत नाम पुराना है और जब मालवों ने उसे अपना लिया तो वह 'मालव-गणाम्नात' या 'मालव-गण-स्थिति' के नाम से पुकारा जाने लगा। किन्तु यह कहा जा सकता है कि यदि कृत एवं मालव दोनों बाद में आने वाले विक्रम संवत की ओर ही संकेत करते हैं, तो दोनों एक साथ ही लगभग एक सौ वर्षों तक प्रयोग में आते रहे, क्योंकि हमें 480 कृत वर्ष एवं 461 मालव वर्ष प्राप्त होते हैं।

यह मानना कठिन है कि कृत संवत का प्रयोग कृतयुग के आरम्भ से हुआ। यह सम्भव है कि 'कृत' का वही अर्थ है जो 'सिद्ध' का है, जैसे- 'कृतान्त' का अर्थ है 'सिद्धान्त' और यह संकेत करता है कि यह कुछ लोगों की सहमति से प्रतिष्ठापित हुआ है। 8वीं एवं 9वीं शती से विक्रम संवत का नाम विशिष्ट रूप से मिलता है। संस्कृत के ज्योति:शास्त्रीय ग्रंथों में यह शक संवत से भिन्नता प्रदर्शित करने के लिए यह सामान्यतः केवल संवत नाम से प्रयोग किया गया है। 'चालुक्य विक्रमादित्य षष्ठ' के 'वेडरावे शिलालेख' से पता चलता है कि राजा ने शक संवत के स्थान पर 'चालुक्य विक्रम संवत' चलाया, जिसका प्रथम वर्ष था - 1076-77 ई.।

नव संवत्सर :

'विक्रम संवत 2074' का शुभारम्भ 28 मार्च, सन 2017 को चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से है। पुराणों के अनुसार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को ब्रह्मा ने सृष्टि निर्माण किया था, इसलिए इस पावन तिथि को नव संवत्सर पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। संवत्सर-चक्र के अनुसार सूर्य इस ऋतु में अपने राशि-चक्र की प्रथम राशि मेष में प्रवेश करता है। भारतवर्ष में वसंत ऋतु के अवसर पर नूतन वर्ष का आरम्भ मानना इसलिए भी हर्षोल्लासपूर्ण है, क्योंकि इस ऋतु में चारों ओर हरियाली रहती है तथा नवीन पत्र-पुष्पों द्वारा प्रकृति का नव शृंगार किया जाता है। लोग नववर्ष का स्वागत करने के लिए अपने घर-द्वार सजाते हैं तथा नवीन वस्त्राभूषण धारण करके ज्योतिषाचार्य द्वारा नूतन वर्ष का संवत्सर फल सुनते हैं।

शास्त्रीय मान्यता के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि के दिन प्रात: काल स्नान आदि के द्वारा शुद्ध होकर हाथ में गंध, अक्षत, पुष्प और जल लेकर ओम भूर्भुव: स्व: संवत्सर- अधिपति आवाहयामि पूजयामि च इस मंत्र से नव संवत्सर की पूजा करनी चाहिए तथा नववर्ष के अशुभ फलों के निवारण हेतु ब्रह्मा जी से प्रार्थना करनी चाहिए कि 'हे भगवन! आपकी कृपा से मेरा यह वर्ष कल्याणकारी हो और इस संवत्सर के मध्य में आने वाले सभी अनिष्ट और विघ्न शांत हो जाएं।' नव संवत्सर के दिन नीम के कोमल पत्तों और ऋतुकाल के पुष्पों का चूर्ण बनाकर उसमें काली मिर्चनमक, हींग, जीरा, मिश्री, इमली और अजवायन मिलाकर खाने से रक्त विकार आदि शारीरिक रोग शांत रहते हैं और पूरे वर्ष स्वास्थ्य ठीक रहता है।

राष्ट्रीय संवत :

 

भारतवर्ष में इस समय देशी विदेशी मूल के अनेक संवतों का प्रचलन है, किंतु भारत के सांस्कृतिक इतिहास की दृष्टि से सर्वाधिक लोकप्रिय राष्ट्रीय संवत यदि कोई है तो वह 'विक्रम संवत' ही है। आज से लगभग 2,068 वर्ष यानी 57 ईसा पूर्व में भारतवर्ष के प्रतापी राजा विक्रमादित्य ने देशवासियों को शकों के अत्याचारी शासन से मुक्त किया था। उसी विजय की स्मृति में चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से विक्रम संवत का भी आरम्भ हुआ था।

 

नये संवत की शुरुआत :

 

प्राचीन काल में नया संवत चलाने से पहले विजयी राजा को अपने राज्य में रहने वाले सभी लोगों को ऋण-मुक्त करना आवश्यक होता था। राजा विक्रमादित्य ने भी इसी परम्परा का पालन करते हुए अपने राज्य में रहने वाले सभी नागरिकों का राज्यकोष से कर्ज़ चुकाया और उसके बाद चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से मालवगण के नाम से नया संवत चलाया। भारतीय कालगणना के अनुसार वसंत ऋतु और चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि अति प्राचीन काल से सृष्टि प्रक्रिया की भी पुण्य तिथि रही है। वसंत ऋतु में आने वाले वासंतिक 'नवरात्र' का प्रारम्भ भी सदा इसी पुण्य तिथि से होता है। विक्रमादित्य ने भारत की इन तमाम कालगणनापरक सांस्कृतिक परम्पराओं को ध्यान में रखते हुए ही चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि से ही अपने नवसंवत्सर संवत को चलाने की परम्परा शुरू की थी और तभी से समूचा भारत इस पुण्य तिथि का प्रतिवर्ष अभिवंदन करता है।

 

दरअसल, भारतीय परम्परा में चक्रवर्ती राजा विक्रमादित्य शौर्य, पराक्रम तथा प्रजाहितैषी कार्यों के लिए प्रसिद्ध माने जाते हैं। उन्होंने 95 शक राजाओं को पराजित करके भारत को विदेशी राजाओं की दासता से मुक्त किया था। राजा विक्रमादित्य के पास एक ऐसी शक्तिशाली विशाल सेना थी, जिससे विदेशी आक्रमणकारी सदा भयभीत रहते थे। ज्ञान-विज्ञान, साहित्यकला संस्कृति को विक्रमादित्य ने विशेष प्रोत्साहन दिया था। धंवंतरि जैसे महान वैद्य, वराहमिहिर जैसे महान ज्योतिषी और कालिदास जैसे महान साहित्यकार विक्रमादित्य की राज्यसभा के नवरत्नों में शोभा पाते थे। प्रजावत्सल नीतियों के फलस्वरूप ही विक्रमादित्य ने अपने राज्यकोष से धन देकर दीन दु:खियों को साहूकारों के कर्ज़ से मुक्त किया था। एक चक्रवर्ती सम्राट होने के बाद भी विक्रमादित्य राजसी ऐश्वर्य भोग को त्यागकर भूमि पर शयन करते थे। वे अपने सुख के लिए राज्यकोष से धन नहीं लेते थे।

 

राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान

 

पिछले दो हज़ार वर्षों में अनेक देशी और विदेशी राजाओं ने अपनी साम्राज्यवादी आकांक्षाओं की तुष्टि करने तथा इस देश को राजनीतिक द्दष्टि से पराधीन बनाने के प्रयोजन से अनेक संवतों को चलाया किंतु भारत राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान केवल विक्रमी संवत के साथ ही जुड़ी रही। अंग्रेज़ी शिक्षा-दीक्षा और पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव के कारण आज भले ही सर्वत्र ईस्वी संवत का बोलबाला हो और भारतीय तिथि-मासों की काल गणना से लोग अनभिज्ञ होते जा रहे हों परंतु वास्तविकता यह भी है कि देश के सांस्कृतिक पर्व-उत्सव तथा रामकृष्णबुद्धमहावीरगुरु नानक आदि महापुरुषों की जयंतियाँ आज भी भारतीय काल गणना के हिसाब से ही मनाई जाती हैं, ईस्वी संवत के अनुसार नहीं। विवाह-मुण्डन का शुभ मुहूर्त हो या श्राद्ध-तर्पण आदि सामाजिक कार्यों का अनुष्ठान, ये सब भारतीय पंचांग पद्धति के अनुसार ही किया जाता है, ईस्वी सन् की तिथियों के अनुसार नहीं।

 

 

 

महानगरों में शिक्षा, माटी से मोह...राजस्थानी संस्कृति से हद तक दीवानगी रखने वाले एेसे ही शख्स है बोया गांव के रिछपालसिंह राणावत।

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Posted By Virendra Pal Singh Denok

राजस्थान/पाली. महानगर बैंगलोर से स्नात्तक और लंदन से मैनेजमेंट की मास्टर डिग्री करने के बाद कोई युवा अपना कॅरियर जन्म भूमि की पहचान के लिए समर्पित कर दे, एेसा आज के दौर में दुर्लभ ही लगता है। राजस्थानी संस्कृति से हद तक दीवानगी रखने वाले एेसे ही शख्स है बोया गांव के रिछपालसिंह राणावत।

महज 28 साल के राणावत ने मायानगरी मुम्बई में राजस्थानी संस्कृति की पहचान बनाने के लिए अपनी शिक्षा के इत्तर राह चुनी। उन्होंने संगीत की दुनिया में कदम रखा। राजस्थानी संगीत को अलग पहचान दिलाने की एेसी धुन सवार हुई कि अब तक वह एक दर्जन से अधिक गानें गा चुके हैं। रिछपाल (रिच्ची बन्ना) के गानों की यू-ट्यूब समेत सोशल मीडिया पर धूम मची रहती है। खासतौर से युवाओं में काफी लोकप्रियता है।

 

महानगरों में शिक्षा, माटी से मोह

रियल एस्टेट कारोबारी रघुवीरसिंह राणावत का लोणावाला मुम्बई में व्यवसाय है। उनके पुत्र रिछपाल की प्रारंभिक शिक्षा बैंगलोर में हुई। तत्पश्चात मैनेजमेंट की डिग्री लंदन से की। पूरी शिक्षा-दीक्षा महानगरों में होने के बावजूद उस पर संस्कार और संस्कृति का प्रभाव रहा। शिक्षा पूरी करने के बाद रिछपाल राजस्थानी भाषा और संस्कृति को बढ़ावा देने में जुट गए। उन्होंने एक टीम बनाई और राजस्थान के विभिन्न हिस्सों में गाने शूट किए। उनके गानों की थीम राजस्थान और उसकी संस्कृति है।

 

 युवाओं व् बच्चों में काफी लोकप्रिय

रिछपालसिंह राणावत खासतौर से युवाओं व् बच्चों में काफी लोकप्रिय है, उन्हें बच्चों से मिलना जुलना भी बहुत अच्छा लगता हैं I      

 

दुनिया में कायम रहे हमारी पहचान

राजस्थान का इतिहास और यहां की संस्कृति जितनी समृद्ध है उतनी शायद ही किसी की होगी। हमारी खूबियां दुनिया के सामने जानी चाहिए। मुझे अपनी माटी से बेहद लगाव है। इसलिए गानों के जरिए दुनिया तक पहुंचा रहा हूं। राजस्थानी गाने युवाओं को खूब पसंद आ रहे हैं। यही मेरी संतुष्टि है। मैं अपनी संस्कृति की पहचान कायम रखने में अपना योगदान देता रहूंगा।

रिछपालसिंह राणावत, निवासी बोया, हाल लोणावाला-मुम्बई

 

 

 

साभार राजस्थान पत्रिका

देखें आपने दिन को कितना जिया ....?

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Posted By Raoji Online

कौन ऐसा होगा , जो नहीं चाहेगा कि उसका जीवन सफलताओं से भरा हो  ऐसी जिंदगी पाने के लिए आप अपने आपसे पूछें कि ' मैंने आज क्या ख़ास किया , जिस वजह से मैं आज के दिन को याद रखूँगा ..? यदि आपके पास कोई उत्तर नहीं है तो इसका मतलब है कि आपने इस दिन को जिया ही नहीं , सिर्फ काटा है I आइए कुछ प्रयोग करें ..

आभारी होना सीखें..

हर सुबह उठकर या हर रात सोने से पहले किन्ही ५ चीजों के लिए कृत्यज्ञता प्रकट करते हुए शुक्रिया अदा करें जैसे कि ' भगवन ! मैं आपका शुक्रगुज़ार हूँ, क्योंकि आपने मुझे एक शानदार जीवन दिया I मुझे सोचने -समझने के लिए बुद्धि दी I मुझे बहुत अच्छा परिवार दिया I मुझमें इतनी शक्ति दी कि मैं दुनिया के लोगों में भलाई फैला सकूँ I आप शुक्रिया अदा करने के योग्य हैं , ये भी एक उपलब्धि है I सुबह का अख़बार उठाकर देख लीजिए , इंटरनेट या टीवी पर देख लीजिए , अलग-अलग देशों में अलग -अलग कारणों से हज़ारों लोगों की आज मृत्यु हुई है I यदि उनमें आपका नाम नहीं हैं , ये भी कृत्यज्ञता का कारण है I

साँसे अद्भुत हैं


एक दिन में कई बार एक मिनट की गहरी श्वास लें I मैं गहरी श्वास का अद्भुत प्रयोग कुछ महीनों से लगातार कर रहा हूँ I आपको बताना चाहता हूँ कि इसने मेरे जीवन में क्रन्तिकारी परिवर्तन किए हैं I जितनी गहरी श्वास ले सकते हैं लें I उसे लें और उस श्वास पर नज़र रखें I महसूस करें कि वो आपके रोम - रोम में , अंग -अंग में समा रही है I जब किसी डील के लिए जाना हो , एक गहरी श्वास लें I किसी बड़े व्यक्तित्व से मिलने जा रहे हों, किसी उलझन या तनाव में हों , ईश्वर की प्राथना करने जा रहे हों, कोई महत्वपूर्ण विचार सुनने या सेमीनार में शामिल होने जा रहे हों , तो एक गहरी श्वास लें I यह श्वास पूरे एक मिनट तक लेने की कोशिश करें I यदि यह संभव न हों तो एक मिनट में दो बार गहरी श्वास लें I आप पाएंगे कि उस एक मिनट की गहरी श्वास ने आपके अंदर के अंतर्विरोधों और तनाव को किस हद तक कम कर दिया है I इस प्रयोग से आप अपने आपको जोड़ पाएंगे I इस एक मिनट की साँस को रोम - रोम में, अंग -अंग में महसूस करें I आप देखेंगे कि भीतर से आप बेहतर , और विशाल , और दिलदार बनते चले जा रहे हैं I हर गहरी श्वास आपको भीतर से बेहतर बनाती है I

सपनों को महसूस करें ...


यह तीसरा क्रन्तिकारी प्रयोग है , एक मिनट कल्पना का , भविष्य को आज देखने का I हर दिन एक बार या दो बार एक मिनट तक अपनी आँख बंद करें और ये महसूस करें कि वो सारी चीजें जिन्हे आप पाना चाहते हैं I वो आपके पास , बिल्कुल आपके सामने है I आप उनका उपयोग कर रहे हैं I यक़ीन मानिए, जिस दिन आप कल्पना करने में सफल हो गए , उसी दिन आप उस उपलब्धि को आपके पास आपने के रास्ते खुलने लगेंगे I कल्पना करने के लिए लक्ष्य बनाने पड़ते है I सबसे पहले ख़ुद से पूछना पड़ता है की मैं क्या पाना चाहता हूँ ? जब आप ये तय कर लेते हैं कि आप क्या पाना चाहते हैं, तब आपके भीतर कल्पना करने कि योग्यता पैदा होती हैं I दुनिया के महान विचारक स्टीवन कवी ने अपनी प्रसिद्द पुस्तक में लिखा हैं की, " काम शुरू करते समय ही उसका अंत आफ नज़र आना चाहिए I " आज से ५-१० साल बाद आप जहाँ पहुंचना चाहते हैं , यदि आप उस क्षण को आज महसूस कर सकते हैं , देख सकते हैं , तो ही आप उस चीज़ को प्राप्त कर सकते हैं I भविष्य कभी भविष्य में निर्मित नहीं होता, वह वर्तमान में निर्मित होता हैं I हर दिन एक मिनट ज़रूर कल्पना करें I कल्पनाए करते वक़्त ख़ूब मुस्कुराएं I लाखों लोगों को हम उनके नाम से नहीं जानते , मगर उनके साथ हमारा मुस्कराहट का रिश्ता है I जब भी हम अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए तैयार होते हैं तो प्रकति हमारी पूरी मदद करती है , पर इसके लिए हमें पूरी तरह से तैयार होना होता है I

ये हैं वो परम्पराएं जो महज़ अन्धविश्वास नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे है वैज्ञानिक कारण

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Posted By Raoji Online
 
 
 
 
 
 
Source: Gazabpost
 

हम तो अपने बच्चों के लिए जी रहे हैं, बस सब सही रास्ते पर लग जाएं...तो अब शिकायत क्यों ...?

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Posted By Raoji Online

जो गलती विजयपत सिंघानिया ने की, आशा साहनी ने की, वो आप मत कीजिए। रिश्तों और दोस्ती की बागबानी को सींचते रहिए, ये जिंदगी आपकी है, बच्चों की बजाय पहले खुद के लिए जिंदा रहिए। आप जिंदा रहेंगे, बच्चे जिंदा रहेंगे। अपेक्षा किसी से भी मत कीजिए, क्योंकि अपेक्षाएं ही दुख का कारण हैं।

 

 

विजयपत सिंघानिया और आशा साहनी, दोनों ही अपने बेटों को अपनी दुनिया समझते थे। पढ़ा-लिखाकर योग्य बनाकर उन्हें अपने से ज्यादा कामयाबी की बुलंदी पर देखना चाहते थे। हर मां, हर पिता की यही इच्छा होती है। विजयपत सिंघानिया ने यही सपना देखा होगा कि उनका बेटा उनकी विरासत संभाले, उनके कारोबार को और भी ऊंचाइयों पर ले जाए। आशा साहनी और विजयपत सिंघानिया दोनों की इच्छा पूरी हो गई। आशा का बेटा विदेश में आलीशान जिंदगी जीने लगा, सिंघानिया के बेटे गौतम ने उनका कारोबार संभाल लिया, तो फिर कहां चूक गए थे दोनों। क्यों आशा साहनी कंकाल बन गईं, क्यों विजयपत सिंघानिया 78 साल की उम्र में सड़क पर आ गए। मुकेश अंबानी के राजमहल से ऊंचा जेके हाउस बनवाया था, लेकिन अब किराए के फ्लैट में रहने पर मजबूर हैं। तो क्या दोषी सिर्फ उनके बच्चे हैं..? 


अब जरा जिंदगी के क्रम पर नजर डालें। बचपन में ढेर सारे नाते रिश्तेदार, ढेर सारे दोस्त, ढेर सारे खेल, खिलौने..। थोड़े बड़े हुए तो पाबंदियां शुरू। जैसे जैसे पढ़ाई आगे बढ़ी, कामयाबी का फितूर, आंखों में ढेर सारे सपने। कामयाबी मिली, सपने पूरे हुए, आलीशान जिंदगी मिली, फिर अपना घर, अपना निजी परिवार। हम दो, हमारा एक, किसी और की एंट्री बैन। दोस्त-नाते रिश्तेदार छूटे। यही तो है शहरी जिंदगी। दो पड़ोसी बरसों से साथ रहते हैं, लेकिन नाम नहीं जानते हैं एक-दूसरे का। क्यों जानें, क्या मतलब है। हम क्यों पूछें..। फिर एक तरह के डायलॉग-हम लोग तो बच्चों के लिए जी रहे हैं। 
मेरी नजर में ये दुनिया का सबसे घातक डायलॉग है-'हम तो अपने बच्चों के लिए जी रहे हैं, बस सब सही रास्ते पर लग जाएं।' अगर ये सही है तो फिर बच्चों के कामयाब होने के बाद आपके जीने की जरूरत क्यों है। यही तो चाहते थे कि बच्चे कामयाब हो जाएं। कहीं ये हिडेन एजेंडा तो नहीं था कि बच्चे कामयाब होंगे तो उनके साथ बुढ़ापे में हम लोग मौज मारेंगे..? अगर नहीं तो फिर आशा साहनी और विजयपत सिंघानिया को शिकायत कैसी। दोनों के बच्चे कामयाब हैं, दोनों अपने बच्चों के लिए जिए, तो फिर अब उनका काम खत्म हो गया, जीने की जरूरत क्या है। 


आपको मेरी बात बुरी लग सकती है, लेकिन ये जिंदगी अनमोल है, सबसे पहले अपने लिए जीना सीखिए। जंगल में हिरन से लेकर भेड़िए तक झुंड बना लेते हैं, लेकिन इंसान क्यों अकेला रहना चाहता है। गरीबी से ज्यादा अकेलापन तो अमीरी देती है। क्यों जवानी के दोस्त बढ़ती उम्र के साथ छूटते जाते हैं। नाते रिश्तेदार सिमटते जाते हैं..। करोड़ों के फ्लैट की मालकिन आशा साहनी के साथ उनकी ननद, भौजाई, जेठ, जेठानी के बच्चे पढ़ सकते थे..? क्यों खुद को अपने बेटे तक सीमित कर लिया। सही उम्र में क्यों नहीं सोचा कि बेटा अगर नालायक निकल गया तो कैसे जिएंगी। जब दम रहेगा, दौलत रहेगी, तब सामाजिक सरोकार टूटे रहेंगे, ऐसे में उम्र थकने पर तो अकेलापन ही हासिल होगा।


इस दुनिया का सबसे बड़ा भय है अकेलापन। व्हाट्सएप, फेसबुक के सहारे जिंदगी नहीं कटने वाली। जीना है तो घर से निकलना होगा, रिश्ते बनाने होंगे। दोस्ती गांठनी होगी। पड़ोसियों से बातचीत करनी होगी। आज के फ्लैट कल्चर वाले महानगरीय जीवन में सबसे बड़ी चुनौती तो ये है कि खुदा न खासता आपकी मौत हो गई तो क्या कंधा देने वाले चार लोगों का इंतजाम आपने कर रखा है..? जिन पड़ोसियों के लिए नो एंट्री का बोर्ड लगा रखा था, जिन्हें कभी आपने घर नहीं बुलाया, वो भला आपको घाट तक पहुंचाने क्यों जाएंगे..?
याद कीजिए दो फिल्मों को। एक अवतार, दूसरी बागबां। अवतार फिल्म में नायक अवतार (राजेश खन्ना) बेटों से बेदखल होकर अगर जिंदगी में दोबारा उठ खड़ा हुआ तो उसके पीछे दो वजहें थीं। एक तो अवतार के दोस्त थे, दूसरे एक वफादार नौकर, जिसे अवतार ने अपने बेटों की तरह पाला था। वक्त पड़ने पर यही लोग काम आए। बागबां के राज मल्होत्रा (अमिताभ बच्चन) बेटों से बेइज्जत हुए, लेकिन दूसरी पारी में बेटों से बड़ी कामयाबी कैसे हासिल की, क्योंकि उन्होंने एक अनाथ बच्चे (सलमान खान) को अपने बेटे की तरह पाला था, उन्हें मोटा भाई कहने वाला दोस्त (परेश रावल) था, नए दौर में नई पीढ़ी से जुड़े रहने की कूव्वत थी। 
 विजयपत सिंघानिया के मरने के बाद सब कुछ तो वैसे भी गौतम सिंघानिया का ही होने वाला था, तो फिर क्यों जीते जी सब कुछ बेटे को सौंप दिया..? क्यों संतान की मुहब्बत में ये भूल गए कि इंसान की फितरत किसी भी वक्त बदल सकती है। जो गलती विजयपत सिंघानिया ने की, आशा साहनी ने की, वो आप मत कीजिए। रिश्तों और दोस्ती की बागबानी को सींचते रहिए, ये जिंदगी आपकी है, बच्चों की बजाय पहले खुद के लिए जिंदा रहिए। आप जिंदा रहेंगे, बच्चे जिंदा रहेंगे। अपेक्षा किसी से भी मत कीजिए, क्योंकि अपेक्षाएं ही दुख का कारण हैं।

 

सिंघानिया परिवार का वंश वृक्ष 

 

 

 

 

source : Social Media

आइए जानते है नवरात्रि का क्या है महत्व ? क्यों होती है 9 कन्याओं का पूजन और कौनसे दिन किस देवी की पूजा करने से क्या होता है लाभ..

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21 सितंबर दिन गुरूवार से शारदीय नवरात्रि 2017 का शुभारंभ होने जा रहा है. नौ दिनों तक चलने वाली इस पूजा में देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है. नवरात्रि में मां दुर्गा की पूजा करने से भक्तों को हर मुश्किल से छुटकारा मिल जाता है. शारदीय नवरात्र के नौ दिन आस्था और भक्ति के साथ ही साधना का अवसर भी लेकर आते हैं I मां के नौ रूपों की इन दिनों आराधना होती है I हर रूप की अपनी विशेषता है उनसे जुड़े गुणों का सन्देश भी I आईये , माँ की प्रेरणा से अपने जीवन में संवर्धन करें I 

नवरात्र का अर्थ है ‘नौ रातों का समूह’ इसमें हर एक दिन दुर्गा मां के अलग-अलग रूपों की पूजा होती है. नवरात्रि हर वर्ष विशेष रूप से दो बार मनाई जाती है. लेकिन शास्त्रों के अनुसार नवरात्रि हिंदू वर्ष में 4 बार आती है. चैत्र, आषाढ़, अश्विन और माघ हिंदू कैलेंडर के अनुसार इन महीनों के शुक्ल पक्ष में आती है.

आषाढ़ और माघ माह के नवरात्रि को गुप्त नवरात्रि कहा जाता है. अश्विन माह के शुक्ल पक्ष में आने वाले नवरात्रों को दुर्गा पूजा नाम से और शारदीय नवरात्र के नाम से भी जाना जाता है. इस वर्ष अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की नवरात्रि 21 सितंबर से शुरू होकर 29 सितंबर तक रहेगी.

क्यों कहते हैं शारदीय नवरात्र

नवरात्रों का त्योहार तब आता है जब दो मौसम मिल रहे हो, अश्विन माह में आने वाले नवरात्रों को शारदीय नवरात्रे इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि इसके बाद से ही मौसम में कुछ ठंडक आने लगती है और शरद ऋतु की शुरुआत हो जाती है.

कौन से दिन किस देवी का है महत्व

21 सितंबर को मां शैलपुत्री की पूजा ..जीवन में स्थिरता के लिए...

नवरात्र के पहले दिन माँ दुर्गा के पहले स्वरूप 'शैलपुत्री' की पूजा होती है । जीवन में अस्थिर लोगों को माता की आराधना करनी चाहिए । इससे जीवन में दृढ़ता आती है ।

पूजन विधि : कलश पर मूर्ति की स्थापना होती है। मूर्ति किसी भी धातु या मिट्टी की हो सकती है। कलश के पीछे स्वास्तिक और उसके युग्म पार्श्व में त्रिशूल बनायें। शैलपुत्री के पूजन करने से 'मूलाधार चक्र' जाग्रत होता है। जिससे अनेक प्रकार की उपलब्धियां प्राप्त होती हैं। धार्मिक मान्यता पर्वतराज हिमालय के यहाँ पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा था।

स्तोत्र पाठ

प्रथम दुर्गा त्वंहि भवसागर: तारणीम्।

धन ऐश्वर्य दायिनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यम्॥

त्रिलोजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयमान्।

सौभाग्यरोग्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यहम्॥

चराचरेश्वरी त्वंहि महामोह: विनाशिन।

मुक्ति भुक्ति दायनीं शैलपुत्री प्रमनाम्यहम्॥

कवच

 ओमकार: में शिर: पातु मूलाधार निवासिनी।

ह्रींकार: पातु ललाटे बीजरूपा महेश्वरी॥

श्रींकार पातु वदने लावाण्या महेश्वरी ।

हुंकार पातु हदयं तारिणी शक्ति स्वघृत।

फट्कार पात सर्वांंगे सर्व सिद्धि फलप्रदा॥

 

22 सितंबर को मां ब्रह्मचारिणी की पूजा का दिन है...शांति की सीख के लिए...

नवरात्र के दूसरे दिन माँ दुर्गा के दूसरे स्वरूप 'ब्रह्मचारिणी' की पूजा होती है। जो खुद पर ध्यान नहीं दे पा रहे हैं , जिन्हे कड़ी मेहनत के बाद भी सफलता नहीं मिल रही है , वे माँ ब्रह्मचारिणी का पूजन करें । माँ से स्वभाव में शालीनता सीख सकते हैं  

स्तोत्र पाठ

 तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्।

ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥

शंकरप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी।

शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥

 

कवच

 त्रिपुरा में हृदयं पातु ललाटे पातु शंकरभामिनी।

अर्पण सदापातु नेत्रो, अर्धरी च कपोलो॥

पंचदशी कण्ठे पातु मध्यदेशे पातु महेश्वरी॥

षोडशी सदापातु नाभो गृहो च पादयो।

अंग प्रत्यंग सतत पातु ब्रह्मचारिणी।

 23 सितंबर को मां चन्द्रघंटा की पूजा अर्चना की जाएगी...समर्पण के लिए 

चंद्रघंटा देवी का स्वभाव व्यक्ति के सतोगुण को बढ़ाने वाला है . अपने साथ दूसरों के लिए जीना , जीवन में समर्पण का गन माँ से सीख सकते हैं । इनके माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसी लिए इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। इनका शरीर स्वर्ण के समान उज्ज्वल है, इनके दस हाथ हैं। दसों हाथों में खड्ग, बाण आदि शस्त्र सुशोभित रहते हैं। इनका वाहन सिंह है। इनकी अराधना से प्राप्त होने वाला सदगुण एक यह भी है कि साधक में वीरता-निर्भरता के साथ ही सौम्यता एवं विनम्रता का विकास होता है।

स्तोत्र पाठ

 आपदुध्दारिणी त्वंहि आद्या शक्तिः शुभपराम्।

अणिमादि सिध्दिदात्री चंद्रघटा प्रणमाभ्यम्॥

चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्टं मन्त्र स्वरूपणीम्।

धनदात्री, आनन्ददात्री चन्द्रघंटे प्रणमाभ्यहम्॥

नानारूपधारिणी इच्छानयी ऐश्वर्यदायनीम्।

सौभाग्यारोग्यदायिनी चंद्रघंटप्रणमाभ्यहम्॥

 कवच

 रहस्यं श्रुणु वक्ष्यामि शैवेशी कमलानने।

श्री चन्द्रघन्टास्य कवचं सर्वसिध्दिदायकम्॥

बिना न्यासं बिना विनियोगं बिना शापोध्दा बिना होमं।

स्नानं शौचादि नास्ति श्रध्दामात्रेण सिध्दिदाम॥

कुशिष्याम कुटिलाय वंचकाय निन्दकाय च न दातव्यं न दातव्यं न दातव्यं कदाचितम्॥

 

24 सितंबर का दिन मां कूष्मांडा की पूजा...क्रोध पर नियंत्रण के लिए 

नवरात्र के चौथे दिन माँ दुर्गा के चौथे स्वरूप 'कूष्माण्डा' की पूजा होती है। उग्र स्वभाव वाली कुष्मांडा देवी क्रोध पर नियंत्रण करना सिखाती हैं । हर काम के शुभारंभ के लिए माँ का पूजन किया जाता हैं . माँ कूष्माण्डा देवी की पूजा से भक्त के सभी रोग नष्ट हो जाते हैं। माँ की भक्ति से आयु, यश, बल और स्वास्थ्य की वृद्धि होती है। संस्कृत भाषा में कूष्माण्ड कूम्हडे को कहा जाता है, कूम्हडे की बलि इन्हें प्रिय है, इस कारण से भी इन्हें कूष्माण्डा के नाम से जाना जाता है।

स्तोत्र पाठ

 दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दरिद्रादि विनाशनीम्।

जयंदा धनदा कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥

जगतमाता जगतकत्री जगदाधार रूपणीम्।

चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥

त्रैलोक्यसुन्दरी त्वंहिदुःख शोक निवारिणीम्।

परमानन्दमयी, कूष्माण्डे प्रणमाभ्यहम्॥

 

कवच

हंसरै में शिर पातु कूष्माण्डे भवनाशिनीम्।

हसलकरीं नेत्रेच, हसरौश्च ललाटकम्॥

कौमारी पातु सर्वगात्रे, वाराही उत्तरे तथा,पूर्वे पातु वैष्णवी इन्द्राणी दक्षिणे मम।

दिगिव्दिक्षु सर्वत्रेव कूं बीजं सर्वदावतु॥

 

25 सितंबर को मां स्कंदमाता की पूजा...दानप्रवृति के लिए 

नवरात्र के पांचवें दिन माँ दुर्गा के पांचवें स्वरूप 'स्कन्दमाता' की पूजा होती है। ज़रुरतमंदो की समय पर मदद करना माँ स्कन्दमाता से सीखें । स्कन्द मातृस्वरूपिणी देवी की चार भुजायें हैं, ये दाहिनी ऊपरी भुजा में भगवान स्कन्द को गोद में पकड़े हैं और दाहिनी निचली भुजा जो ऊपर को उठी है, उसमें कमल पकड़ा हुआ है। इनका वाहन 'सिंह' है। माँ दुर्गा के पांचवें स्वरूप को स्कन्दमाता के रूप में जाना जाता है। इन्हें स्कन्द कुमार कार्तिकेय नाम से भी जाना जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि इस चक्र में अवस्थित साधक के मन में समस्त बाह्य क्रियाओं और चित्तवृत्तियों का लोप हो जाता है और उसका ध्यान चैतन्य स्वरूप की ओर होता है, समस्त लौकिक, सांसारिक, मायाविक बन्धनों को त्याग कर वह पद्मासन माँ स्कन्दमाता के रूप में पूर्णतः समाहित होता है।

स्तोत्र पाठ

नमामि स्कन्दमाता स्कन्दधारिणीम्।

समग्रतत्वसागररमपारपार गहराम्॥

शिवाप्रभा समुज्वलां स्फुच्छशागशेखराम्।

ललाटरत्नभास्करां जगत्प्रीन्तिभास्कराम्॥

महेन्द्रकश्यपार्चिता सनंतकुमाररसस्तुताम्।

सुरासुरेन्द्रवन्दिता यथार्थनिर्मलादभुताम्॥

अतर्क्यरोचिरूविजां विकार दोषवर्जिताम्।

मुमुक्षुभिर्विचिन्तता विशेषतत्वमुचिताम्॥

नानालंकार भूषितां मृगेन्द्रवाहनाग्रजाम्।

सुशुध्दतत्वतोषणां त्रिवेन्दमारभुषताम्॥

सुधार्मिकौपकारिणी सुरेन्द्रकौरिघातिनीम्।

शुभां पुष्पमालिनी सुकर्णकल्पशाखिनीम्॥

तमोन्धकारयामिनी शिवस्वभाव कामिनीम्।

सहस्त्र्सूर्यराजिका धनज्ज्योगकारिकाम्॥

सुशुध्द काल कन्दला सुभडवृन्दमजुल्लाम्।

प्रजायिनी प्रजावति नमामि मातरं सतीम्॥

स्वकर्मकारिणी गति हरिप्रयाच पार्वतीम्।

अनन्तशक्ति कान्तिदां यशोअर्थभुक्तिमुक्तिदाम्॥

पुनःपुनर्जगद्वितां नमाम्यहं सुरार्चिताम्।

जयेश्वरि त्रिलोचने प्रसीद देवीपाहिमाम्॥

कवच

ऐं बीजालिंका देवी पदयुग्मघरापरा।

हृदयं पातु सा देवी कार्तिकेययुता॥

श्री हीं हुं देवी पर्वस्या पातु सर्वदा।

सर्वांग में सदा पातु स्कन्धमाता पुत्रप्रदा॥

वाणंवपणमृते हुं फट्‌ बीज समन्विता।

उत्तरस्या तथाग्नेव वारुणे नैॠतेअवतु॥

इन्द्राणां भैरवी चैवासितांगी च संहारिणी।

सर्वदा पातु माँ देवी चान्यान्यासु हि दिक्षु वै॥

 

26 सितंबर को मां कात्यायनी की पूजा...सामंजस्य के लिए 

नवरात्र के छठे दिन माँ दुर्गा के छठे स्वरूप 'कात्यायनी' की पूजा होती है । जीवन में सामंजस्य का महत्व माँ कात्यायनी से सीख सकते हैं । पारिवारिक क्लेश हो रहा हैं अथवा विवाह में विलंभ हो रहा हैं, तो माँ की अर्चना करें ।इनकी चार भुजायें हैं, दाहिना ऊपर का हाथ अभय मुद्रा में है, नीचे का हाथ वरदमुद्रा में है। बांये ऊपर वाले हाथ में तलवार और निचले हाथ में कमल का फूल है और इनका वाहन सिंह है। महर्षि कात्यायन ने इनकी पूजा की, इसी कारण से यह देवी कात्यायनी कहलायीं। माँ कात्यायनी की भक्ति से मनुष्य को अर्थ, कर्म, काम, मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। आज के दिन साधक का मन आज्ञाचक्र में स्थित होता है। योगसाधना में आज्ञाचक्र का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस चक्र में स्थित साधक कात्यायनी के चरणों में अपना सर्वस्व अर्पित कर देता है।

स्तोत्र पाठ

कंचनाभा वराभयं पद्मधरा मुकटोज्जवलां।

स्मेरमुखीं शिवपत्नी कात्यायनेसुते नमोअस्तुते॥

पटाम्बर परिधानां नानालंकार भूषितां।

सिंहस्थितां पदमहस्तां कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥

परमांवदमयी देवि परब्रह्म परमात्मा।

परमशक्ति, परमभक्ति,कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥

 

कवच

कात्यायनी मुखं पातु कां स्वाहास्वरूपिणी।

ललाटे विजया पातु मालिनी नित्य सुन्दरी॥

कल्याणी हृदयं पातु जया भगमालिनी॥

 

27 सितंबर को मां कालरात्रि की पूजा ...सेवाभाव के लिए 

नवरात्र के सातवें दिन माँ दुर्गा के सातवें स्वरूप 'कालरात्रि' की पूजा होती है । माँ कालरात्रि  से नि: स्वार्थ भाव से मदद करने की सीख मिलती हैं । एकाकी महसूस करने वाले लोग कालरात्रि का पूजन करें । इनके शरीर का रंग काला, बाल बिखरे हुए, गले में विद्युत की भाँति चमकने वाली माला है। इनके तीन नेत्र हैं जो ब्रह्माण्ड की तरह गोल हैं, जिनमें से बिजली की तरह चमकीली किरणें निकलती रहती हैं। इनका वाहन 'गर्दभ' (गधा) है। दाहिने ऊपर का हाथ वरद मुद्रा में सबको वरदान देती हैं, दाहिना नीचे वाला हाथ अभयमुद्रा में है। बायीं ओर के ऊपर वाले हाथ में लोहे का कांटा और निचले हाथ में खड्ग है। भगवती कालरात्रि का ध्यान, कवच, स्तोत्र का जाप करने से 'भानुचक्र' जागृत होता है। इनकी कृपा से अग्नि भय, आकाश भय, भूत पिशाच स्मरण मात्र से ही भाग जाते हैं। इस दिन साधक का मन सहस्त्रारचक्र में अवस्थित होता है। साधक के लिए सभी सिद्धियों का द्वार खुलने लगता है।

स्तोत्र पाठ

ह्रीं कालरात्रि श्रींं कराली च क्लीं कल्याणी कलावती।

कालमाता कलिदर्पध्नी कमदीश कुपान्विता॥

कामबीजजपान्दा कामबीजस्वरूपिणी।

कुमतिघ्नी कुलीनर्तिनाशिनी कुल कामिनी॥

क्लीं ह्रीं श्रीं मन्त्र्वर्णेन कालकण्टकघातिनी।

कृपामयी कृपाधारा कृपापारा कृपागमा॥

 

कवच

ऊँ क्लीं मे हृदयं पातु पादौ श्रीकालरात्रि।

ललाटे सततं पातु तुष्टग्रह निवारिणी॥

रसनां पातु कौमारी, भैरवी चक्षुषोर्भम।

कटौ पृष्ठे महेशानी, कर्णोशंकरभामिनी॥

वर्जितानी तु स्थानाभि यानि च कवचेन हि।

तानि सर्वाणि मे देवीसततंपातु स्तम्भिनी॥

 

28 सितंबर को अष्टमी और इस दिन मां महागौरी की पूजा...कर्मशीलता के लिए 

नवरात्र के आठवें दिन माँ दुर्गा के आठवें स्वरूप 'महागौरी' की पूजा होती है। माँ महागौरी से कर्मशीलता सीख सकते हैं । आसानी से प्रसन्न होने वाली गौरी कर्मशील लोगों को हमेशा समय से पहले फल देती हैं । इनका वर्ण पूर्णतः गौर है। इस गौरता की उपमा शंख, चन्द्र और कून्द के फूल की गयी है। इनकी आयु आठ वर्ष बतायी गयी है। इनका दाहिना ऊपरी हाथ में अभय मुद्रा में और निचले दाहिने हाथ में त्रिशूल है। बांये ऊपर वाले हाथ में डमरू और बांया नीचे वाला हाथ वर की शान्त मुद्रा में है। इनकी तपस्या से प्रसन्न होकर जब शिव जी ने इनके शरीर को पवित्र गंगाजल से मलकर धोया तब वह विद्युत के समान अत्यन्त कांतिमान गौर हो गया, तभी से इनका नाम गौरी पड़ा। देवी महागौरी का ध्यान, स्रोत पाठ और कवच का पाठ करने से 'सोमचक्र' जाग्रत होता है जिससे संकट से मुक्ति मिलती है और धन, सम्पत्ति और श्री की वृद्धि होती है।

स्तोत्र पाठ

सर्वसंकट हंत्री त्वंहि धन ऐश्वर्य प्रदायनीम्।

ज्ञानदा चतुर्वेदमयी महागौरी प्रणमाभ्यहम्॥

सुख शान्तिदात्री धन धान्य प्रदीयनीम्।

डमरूवाद्य प्रिया अद्या महागौरी प्रणमाभ्यहम्॥

त्रैलोक्यमंगल त्वंहि तापत्रय हारिणीम्।

वददं चैतन्यमयी महागौरी प्रणमाम्यहम्॥

 

कवच

ओंकारः पातु शीर्षो मां, हीं बीजं मां, हृदयो।

क्लीं बीजं सदापातु नभो गृहो च पादयो॥

ललाटं कर्णो हुं बीजं पातु महागौरी माँ नेत्रं घ्राणो।

कपोत चिबुको फट् पातु स्वाहा मा सर्ववदनो॥

29 को महानवमी और इस दिन मां सिद्धदात्री की पूजा और कन्या पूजन...ख़ुशमिज़ाजी के लिए 

 

नवरात्र के नवें दिन माँ दुर्गा के नवें स्वरूप 'सिद्धिदात्री' की पूजा होती है । तनाव में या दुखी रहने वालों को माता सिद्धिदात्री की आराधना करनी चाहिए । यह अष्टसिद्धियां , नवनिधियाँ देने वाली हैं  ।माता सिद्धिदात्री चार भुजाओं वाली हैं। इनका वाहन सिंह है। ये कमल पुष्प पर आसीन हैं। इनकी दाहिनी नीचे वाली भुजा में चक्र, ऊपर वाली भुजा में गदा और बांयी तरफ नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमल पुष्प है। माता सिद्धिदात्री की अनुकम्पा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण वह संसार में 'अर्द्धनारीश्वर' नाम से प्रसिद्ध हुए। भगवती सिद्धिदात्री का ध्यान, स्तोत्र व कवच का पाठ करने से 'निर्वाण चक्र' जाग्रत हो जाता है।

स्तोत्र पाठ

कंचनाभा शखचक्रगदापद्मधरा मुकुटोज्वलो।

स्मेरमुखी शिवपत्नी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥

पटाम्बर परिधानां नानालंकारं भूषिता।

नलिस्थितां नलनार्क्षी सिद्धीदात्री नमोअस्तुते॥

परमानंदमयी देवी परब्रह्म परमात्मा।

परमशक्ति, परमभक्ति, सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥

विश्वकर्ती, विश्वभती, विश्वहर्ती, विश्वप्रीता।

विश्व वार्चिता विश्वातीता सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥

भुक्तिमुक्तिकारिणी भक्तकष्टनिवारिणी।

भव सागर तारिणी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥

धर्मार्थकाम प्रदायिनी महामोह विनाशिनी।

मोक्षदायिनी सिद्धीदायिनी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते॥

 

कवच

ओंकारपातु शीर्षो माँ ऐं बीजं माँ हृदयो।

हीं बीजं सदापातु नभो, गुहो च पादयो॥

ललाट कर्णो श्रीं बीजपातु क्लीं बीजं माँ नेत्र घ्राणो।

कपोल चिबुको हसौ पातु जगत्प्रसूत्यै माँ सर्व वदनो॥

 

क्यों होता है 9 कन्याओं का पूजन...

नौ कन्याएं को नौ देवियों का रूप माना जाता है. इसमें दो साल की बच्ची, तीन साल की त्रिमूर्ति, चार साल की कल्याणी, पांच साल की रोहिणी, छ: साल की कालिका, सात साल की चंडिका, आठ साल की शाम्भवी, नौ साल की दुर्गा और दस साल की कन्या सुभद्रा का स्वरूप होती हैं.

नवरात्रि के आते ही ही घर-घर में मां के आगमन की तैयारियां भी शुरू हो गई हैं. गुरुवार से शुरू होने वाली नवरात्रि के नौ दिनों में यदि नौ विशेष चीजों का इस्तेमाल किया जाए तो इससे मां की कृपा भक्तों पर बनी रहती है.

थार की लोक संस्कृति में जानते है फड़, फड के प्रकार, भोपें, पवाडे, माटे, माटा वादन

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पाबूजी

पाबूजी की फड़ एक प्रकार का गीत नाट्य है, जिसे अभिनय के साथ गाया जाता है। यह सम्पूर्ण राजस्थान में विख्यात है। 'फड़' लम्बे कपड़े पर बनाई गई एक कलाकृति होती है, जिसमें किसी लोक देवता (विशेष रूप से पाबूजी या देवनारायण) की कथा का चित्रण किया जाता है। फड़ को लकड़ी पर लपेट कर रखा जाता है। इसे धीरे-धीरे खोल कर भोपा तथा भोपी द्वारा लोक देवता की कथा को गीत व संगीत के साथ सुनाया जाता है। पाबूजी के अलावा अन्य लोकप्रिय फड़ 'देवनारायण जी की फड़' होती है।

फड़

 


राजस्थान के प्रसिद्ध लोक देवता 'पाबूजी' के यशगान में 'पवाडे (गीत) गाये जाते हैं व मनौती पूर्ण होने पर फड़ भी बाँची जाती है। 'पाबूजी की फड़' पूरे राजस्थान में विख्यात है, जिसे 'भोपे' बाँचते हैं। ये भोपे विशेषकर भील या थोरी जाति के होते हैं। फड़ कपड़े पर पाबूजी के जीवन प्रसंगों के चित्रों से युक्त एक पेंटिंग होती है। भोपे पाबूजी के जीवन कथा को इन चित्रों के माध्यम से कहते हैं और गीत भी गाते हैं। इन भोपों के साथ एक स्त्री भी होती है, जो भोपे के गीतोच्चारण के बाद सुर में सुर मिलाकर पाबूजी की जीवन लीलाओं के गीत गाती है। फड़ के सामने ये नृत्य भी करते हैं। ये गीत रावण हत्था पर गाये जाते हैं, जो सारंगी के जैसा वाद्य यंत्र होता है। 'पाबूजी की फड़' लगभग 30 फीट लम्बी तथा 5 फीट चौड़ी होती है। इस फड़ को एक बाँस में लपेट कर रखा जाता है ।

लोक देवता की कथा


राजस्थान में कुछ जगहों पर जाति विशेष के भोपे पेशेवर पुजारी होते हैं। उनका मुख्य कार्य किसी मन्दिर में देवता की पूजा करना तथा देवता के आगे नाचना, गाना तथा कीर्तन आदि करना होता है। पाबूजी तथा देवनारायण के भोपे अपने संरक्षकों (यजमानों) के घर पर जाकर अपना पेशेवर गाना व नृत्य के साथ फड़ के आधार पर लोक देवता की कथा कहते हैं। राजस्थान में पाबूजी तथा देवनारायण के भक्त लाखों की संख्या में हैं। इन लोक देवताओं को 'कुटुम्ब के देवता' के रूप में पूजा जाता है और उनकी वीरता के गीत भोपों और भाटों द्वारा गाए जाते हैं। भोपों ने पाबूजी और देवनारायण जी की वीरता के सम्बन्ध में सैंकड़ों लोक गीत रचें हैं और इनकी गीतात्मक शौर्यगाथा(पवाडों) को इनके द्वारा फड़ का प्रदर्शन करके आकर्षक और रोचक ढंग से किया जाता है।

भोपा


पाबूजी के भोपों ने पाबूजी की फड़ के गीत को अभिनय के साथ गाने की एक विशेष शैली विकसित कर ली है। पाबूजी की फड़ लगभग 30 फीट लम्बी तथा 5 फीट चौड़ी होती है। इसमें पाबूजी के जीवन चरित्र शैली के चित्रों में अनुपात रंगों एवं रंग एवं फलक संयोजन के जरिए प्रस्तुत करता है। राजस्थान में 'भोपा' का अर्थ किसी देवता का पुजारी होता है। ये मंदिर में पूजा अर्चना करते हैं। ये भोपे मंदिर भेरूजी, माताजी अन्य स्थानीय देवता अथवा लोक देवता या लोक देवी का हो सकते है। सामान्यतः भोपा किसी भी जाति, जैसे- ब्राह्मण, राजपूत, गुर्जर, जाट, रेबारी, डांगी, मेघवाल, भील आदि किसी का भी हो सकता है, किंतु पाबूजी तथा देवनारायण जी की कथा व फड़ बांचने वाले भोपे "भोपा" नामक विशेष जाति के होते हैं।

पाबूजी-पड़ बांचना


पड़ बंचवाने के लिये संबंधित भोपे को ‘आखे’ देने के लिये जाना पड़ता है । भोपा आखे ग्रहण करके आमंत्रण स्वीकार करता है और पड़ बंचवाने वाले व्यक्ति से तय कर लेता है । निश्चित तिथि को भोपा-भोपी पड़ आदि सामग्री लेकर वहां पहुंचता है । पड़ अधिकतर बड़े महीने भाद्रपद और माघ माह के शुक्ल पक्ष में बंचवायी जाती है । कृष्ण पक्ष में भोपा कभी पड़ नहीं बांचता । फाल्गुन महीने को भी राक्षसी मास गिना जाता है, इसलिये इस महीने में भी पड़ नहीं बांची जाती । पड़ अधिकतर रात में ही बांची जाती है ।...पड़ गोल कपड़े के थान-सी सिमटी हुई होती है जिसके किनारों पर चार चार फीट के दो डंडे होते हैं जो पड़ के कपड़े से सिले हुए होते हैं । पड़ के ऊपरी लंबाई वाले किनारे में एक सूत की रस्सी सिली हुई होती है जो बाहर करीब पांच-पांच फीट निकली होती है । पड़ को जब प्रस्तुत करने के लिये फैलाते हैं तो वह डंडों व रस्सी के सहारे तन जाती है । तनी हुई सूत की रस्सी को पास में ही जमीन पर पड़ के दोनों कोनों में गाड़ी हुई खूंटियों में बांध देते हैं ।.... इस पड़ के आगे दर्शकगणों को बैठाने के लिये ‘बिछायत’ की जाती है । पड़ से सात-आठ फीट दूरी छोड़कर दर्शक बैठते हैं । पड़ बांचने से पुर्व भोपे द्वारा काम में ली जाने वाली आवश्यक पूजा सामग्री एक थाल में रखकर भोपे को देनी होती है । भोपा इस थाल को पड़ के सामने ‘बाजोट’ पर रख देता है । फिर धूपिया में ‘जागता’ लेकर जोत करता है जिसमें गुड़ का धूप किया जाता है । भोपा अगरबती करके सर्व प्रथम ‘सिंवरणा’ करता है जिसमें सभी देवी-देवताओं का स्मरण किया जाता है ताकि पड़ को निर्विघ्न बांचा जा सके । पड़ कभी अधूरी नहीं बांची जाती । अधूरी पड़ को अशुभ माना जाता है । सिंवरणा के बाद शंखनाद किया जाता है । भोपी ‘पळी’ में बाती करके तेल डाल लेती है और उसे जला कर अपने हाथों में ले लेती है । भोपे के पैरों में बंधे घुंघरू, हाथों में वाद्य, सरस सजी पड़ की लोकगाथा और सुरीली राग में भोपे की टेर में टेर मिलाकर गाती भोपी पड़ पर मंडे चित्रों को सजीव कर देती है । भोपा गाथा को गाते नाचता हुआ दर्शकों के बीच जाता है परन्तु भोपी नहीं नाचती और न ही पड़ के मध्य में पाबूजी के बड़े चित्र के सामने आकर खड़ी होती है । वह पड़ में एक तरफ ही खड़ी गाती है ।...दर्शक भोपे को उपहार स्वरूप जब राशि देते हैं तो भोपा प्राप्त राशि को थाल में रखकर शंखनाद करता है । पड़ कथा संपूर्ण होने पर भोपा भोपी ‘चोयगा’ (चोपाया पशु) मंडवाने/देने का आग्रह करते हैं । पाबूजी के ‘झुरावै’भी गाये जाते हैं इसके साथ थाली वादन करते है।
पाबुजी रा भोपे फड बांचता समय वाद्ययंत्र गूजरी/रावणहत्था बजाते है । इसके अलावा पाबूजी के भोपे माटा वादन भी करते हैं। जब भोपे को आखा दे, वहीं फड बांचते है, अन्यथा नहीं ।’भक्त गण जागरण पर पड़ खोलने का 125 रूपया देते है। यहां चित्रों में भील जाति के भोपा लोग ‘गोळी/माटा’ बजाते हुए दिखाए गए हैं । आसोज के नौरतों में वे ‘घूमते’ हैं अर्थात् नाचते हैं । संध्या को पूजा में ‘गोळी’ बजाते हैं । बाकी दिनों में उन्हें उलटा करके थान पर रखते हैं। मुझे खुशी है कि मै भी पाबूजी भालाला के जन्म स्थान कोलू पाबूजी के निकट लोहावट पंचायत समिति में कार्यरत हैं। मेरा थार की लोक संस्कृति में विशेष रूचि होने के कारण कई भील भोपों से संवाद होता रहता है और कई बार फड बांचन कार्यक्रम में भी शरीक हो चुका हूं। डिंगल शैली में रावण हत्था के साथ उच्च स्वर में पाबूजी के वीर रस के पवाडे सुनकर दिल रोमांचित हो उठता है। थार की इन अनूठी लोकानुरंजन की लोक विधाओं को प्रचारित प्रसारित और संरक्षित करने की महती आवश्यकता है। तभी हम आने वाली पीढ़ियां को अपनी थार की अनूठी लोकसंस्कृति हस्तांतरण कर पाएंगे। मैं भी अगली पोस्ट में माटा वादन और पड़ का विडियो शेयर करने की कोशिश करूंगा। देखिये रहिए थार की लोक संस्कृति के रंग और रूबरू होते रहिये थार की अनूठी और रंग रूडी लोक संस्कृति से।
(नोट :यह पोस्ट आर ए एस प्रतियोगिता परीक्षार्थियों के लिए उपयोगी है।)

साभार : नरपतसिंह हरसाणी।
नरपतसिंह भाटी हरसाणी, राजस्थान ग्रामीण विकास राज्य सेवा में अधिकारी हैं । बाडमेर जिले के हरसाणी गांव के रहने वाले हैं । तथा वर्तमान में लोहावट पंचायत समिति में खंड विकास अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं ।

 

 

एक बार फिर आ रहे हैं अयोध्या में भगवान् श्री राम...

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Posted By Virendra Pal Singh Denok

अयोध्‍या सरयू तट पर राम की 100 मीटर ऊंची मूर्ति बनवाएगी योगी सरकार, राजभवन में द‍िया प्रेजेंटेशन


‘नया अयोध्या’ प्लान के तहत उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार अयोध्या में सरयू नदी के पास भगवान राम की एक विशाल मूर्ति बनाने की तैयारी कर रही है। धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के मकसद से राज्य के पर्यटन विभाग ने इसकी एक प्रेजेंटेशन गवर्नर राम नाइक को दिखाई है। कुछ अधिकारियों ने कहा कि सरकार के स्लाइड शो में भगवान राम की मूर्ति 100 मीटर रखने की बात कही गई है, लेकिन यह फाइनल नहीं है। राज भवन से जारी एक प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक पर्यटन विभाग के प्रिंसिपल सेक्रेटरी अवनीश कुमार अवस्थी ने यह प्रेजेंटेशन बनाई है। इसमें 18 अक्टूबर को अयोध्या में होने वाले दीवाली समारोह के लिए तय किए गए कार्यक्रमों की जानकारी होगी। गवर्नर राम नाइक, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, केंद्रीय पर्यटन मंत्री केजे अलफोंस और संस्कृति मंत्री महेश शर्मा भी इस समारोह में मौजूद रहेंगे। विज्ञप्ति में कहा गया कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) से मंजूरी मिलने के बाद मूर्ति को सरयू घाट पर बनाया जाएगा। जब मूर्ति के बारे में अवस्थी ने सहयोगी इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि अभी यह ‘कॉन्सेप्ट प्रोजेक्ट’ है और एनजीटी से मंजूरी पाने के लिए पत्र भेजा जाना बाकी है। इसके अलावा नदी के तट पर राम कथा गैलरी, दिगंबर अखाड़ा परिसर में अॉडिटोरियम और अन्य सार्वजनिक सुविधाएं बनाने की भी प्लानिंग है। अयोध्या के एकीकृत विकास के लिए राज्य सरकार ने केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय को 195.89 करोड़ की डीपीआर भेजी है और मंत्रालय राज्य सरकार को अब तक 133.70 करोड़ रुपये दे चुका है।

दिवाली पर होने वाले कार्यक्रम:
18 अक्टूबर को शहर में दीपोत्सव कार्यक्रम होगा, जिसमें 1.71 लाख दीये राम की पैड़ी पर जलाए जाएंगे। यह इलाका विवादित स्थल से 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसके अलावा शहर में एक शोभा यात्रा भी निकाली जाएगी, जो भगवान राम के अयोध्या आने के तौर पर मनाया जाएगा और फिर उनका राज्यभिषेक होगा। बाद में सीएम आदित्यनाथ और गवर्नर राम नाइक अयोध्या में कई विकास परियोजनाओं की नींव रखेंगे। दोनों सरयू नदी के नए घाट पर आरती भी करेंगे। इसके बाद इंडोनेशिया और थाइलैंड से आए कलाकार रामलीला का मंचन करेंगे।

इसी के साथ भारत में और भी कुछ आदमकद मुर्तिया प्रस्तावित हैं और निर्माणाधीन हैं ...

स्टेचू ऑफ यूनिटी:

भारत के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की 182 मीटर (597 फीट) ऊंची मूर्ति दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा होगी। स्टैच्यू ऑफ यूनिटी 182 मीटर (597 फीट) ऊँचा गुजरात सरकार द्वारा प्रस्तावित भारत के प्रथम उप प्रधानमन्त्री तथा प्रथम गृहमन्त्री सरदार पटेल का स्मारक है। गुजरात के मुख्यमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने 31 अक्टूबर 2013 को सरदार पटेल के जन्मदिवस के मौके पर इस विशालकाय मूर्ति के निर्माण का शिलान्यास किया। यह स्मारक सरदार सरोवर बांध से 3.2 किमी की दूरी पर साधू बेट नामक स्थान पर है जो कि नर्मदा नदी पर एक टापू है। यह स्थान भारतीय राज्य गुजरात के भरूच के निकट नर्मदा जिले में है।

शिवाजी की मूर्ति:

मुंबई में गिरगांव चौपाटी के नजदीक समुद्र में तट से करीब डेढ़ किलोमीटर अंदर छत्रपति शिवाजी महाराज के स्मारक का निर्माण होगा छत्रपति शिवाजी महाराज का यह विशाल स्मारक दुनिया का सबसे बड़ा स्मारक होगा. शिवाजी की मूर्ति अमेरिका के स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी से भी बड़ी होगी. 192 मीटर ऊंचे इस स्मारक के लिए बनने वाला आधार 77 मीटर होगा. इसी आधार पर घोड़े पर सवार छत्रपति शिवाजी की मूर्ति 114 मीटर की होगी. पूरे स्मारक को 13 हेक्टेयर में फैले चट्टानों पर बनाया जाने वाला है.

Ranbankure - Comming Soon ... @ Pali

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Posted By Raoji Online

राजा मयूरध्वज व् सुराणा समाज से तालुक रखता है मोरखाना गांव

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ओसवाल समाज के सुराणा कुल की कुलदेवी सुसवाणी माता
Posted By Raoji Online

बीकानेर जिले के नोखा तहसील में स्थित है मोरखाना गांव । जो बीकानेर की विश्व प्रसिद्ध शक्ति पीठ करणी माता मंदिर देशनोक से 21 किलोमीटर दक्षिण पूर्व में आया हुवा हैं। गांव एवं आसपास के क्षेत्र में प्रचलित मान्यताओं के अनुसार इस गांव का प्राचीन नाम मोर खियाणा था और यह पुराणों में वर्णित राजा मयूरध्वज की राजधानी थी। गांव में स्थित एक प्राचीन वृक्ष के बारे में यह मान्यता है की यह वही वृक्ष है जिससे गिरकर उस मोर की मृत्यु हुई थी और फिर भगवान शिव के आशीर्वाद से वह मनुष्य के रूप में पुनर्जीवित हुवा था। गाँव में एक पुराना शिव मंदिर भी स्तिथ है जिसके बारे में मान्यता है कि यहाँ भगवन शिव ने कभी तपस्या की थी। ओसवाल समाज के सुराणा कुल की कुलदेवी सुसवाणी माता का मंदिर भी यहाँ स्तिथ है जहाँ प्रदेश भर से इस कुल के लोग दर्शन करने पहुँचते हैं। इन माता जी की प्रचलित कथा के अनुसार ये जब 13 वर्ष की थी तब नागौर के मुसलमान शासक ने इनसे विवाह करना चाहा । वे वहाँ से भाग आयी और यहाँ आकर भगवान् शिव के मंदिर में शरण ली, प्राथना की । कहते हैं भगवान  इनकी प्राथना पर प्रकट हुए और अपना त्रिशूल फैंक कर कहा कि जहाँ यह गिरे वही तेरा आश्रय स्थल हैं। त्रिशूल एक कैर के झाड़ के बीच गिरा।सुसवाणी माता उसी कैर में समां गयीं। आज वहाँ उनका विशाल बना हुवा हैं जिसमे वह कैर का झाड़ भी स्थित हैं।

नवरात्रि में इस मंदिर बड़ा मेला लगता है। शिवरात्रि में भी बड़ा मेला भरता है। सुसवाणी माता मंदिर ट्रस्ट और गांव वासियों के सहयोग से यहाँ कई धर्म शालाएं बनी हुई हैं जहाँ वर्ष पर्यन्त यात्री आकर रुकते हैं जिनकी निशुल्क व्यवस्था की जाती है। गांव के चारो ओर प्रवेश द्वार बने हुए हैं। गांव में 400 बीघा ओरण भूमि है एवं ट्रस्ट के सहयोग से ग्रामवासी एक गोशाला भी चलाते है। वर्तमान में यह गांव अर्जुनोत भाटियों का है लेकिन गाँव के इतिहास के अनुसार 12वीं व् 13वीं शताब्दी में यहाँ साँखला राजपूतों का शासन था। कालान्तर में भाटियों ने यहाँ अधिकार कर लिया था। वर्तमान में 400 परिवार अर्जनोत भाटियों के हैं। इसके अलावा 10 परिवार खींया भाटियों के , 5 परिवार नारणोत भाटियों के , 150 परिवार मेघवालों के , 100 परिवार नायकों के , 10 सेवग, 5 हरिजन , 1 साध, 2 नाइ , 5 लोहार एवं 1 ढोली का परिवार गांव में निवास करते है। 

श्री बगतेश की नगरी पांच पंचायतों में फैला है पीलवा गांव

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श्री बगतेस भोमियाजी
Posted By Raoji Online

राजस्थान / जोधपुर / फलोदी : जोधपुर जिला मुख्यालय से 110 किलोमीटर उत्तर की ओर स्तिथ गांव पीलवा लगभग 12 किलोमीटर के दायरे में फैला हुवा है l वर्तमान में इस गांव में भोजाकोर, सदरी, फतेहसागर, दयाकौर, कुशलावा व रावतनगर ग्राम पंचायतों का गठन हुवा है l ये सभी मूल रूप से पीलवा के भाग ही जाने जाते हैं l

 राजपूतों के चांपावत राठौड़ो की बहुतायत वाला यह गांव 14 वीं शताब्दी तक देवराज राठौड़ो का गांव था l उसी समय पाली जिले के कंटालिया गांव से उदैभान जी चांपावत यहाँ आये और तब से यहाँ के जागीरदार विट्टलदासोत चांपावत राठौड़ राजपूत हुए l वर्तमान में गांव में 700 परिवार चांपावत राजपूतों के हैं और उनके नो वास हैं l इसके अलावा 100 जसोड़ भाटियों के, 100 देवराज राठोड़ों के हैं l राजपूतों के अलावा गांव में राजपुरोहित, विश्नोई, जाट, मेघवाल, कुम्हार, ब्राह्मण, महाजन, भील, खत्री, देशांतरी, स्वामी, साद, ढोली, लोहार, सुनार, नाइ, दर्जी, गवारिया, रावण राजपूत, सुथार, हरिजन, जोगी, साटिया सहित लगभग सभी जातियों के 3000 से अधिक परिवार गांव में बसते हैं l जोधपुर जिले की फलोदी तहसील व लोहावट विधानसभा में स्तिथ गांव में मूलभूत सुविधाओ का विस्तार निकट के अन्य गाँवो की अपेक्षा तेजी से हुवा l आज से 50 वर्ष पूर्व बने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र व पेयजल के लिए खुदे ट्यूबवेलों से आस पास के सभी गांव लाभाविन्त होते हैं l वर्तमान में गांव में एक उच्च माध्यमिक विद्यालय सरकारी तौर पर संचालित है l

लोक देवता बगतसिंह : पुरे गांव में लोक देवता बगतसिंह को आराध्य के रूप में पूजा जाता है और उनके चमत्कारों के कारण सुदूर मालाणी क्षेत्र के गाँवो से भी श्रद्धालओं की आवाजाही रहती है l बगतसिंह जी वीरतापूर्वक जुंझ कर जुंझार हुए थे l गांव के मध्य उनका भव्य मंदिर बना हुवा है l हर माह की पूर्णिमा को विशाल मेला भरता है एवं चैत्री पूर्णिमा को विशाल जागरण होता है l रात्रि 12 बजे पुरे गांव की परिक्रमा की जाती है एवं गांव के सभी घरों से लाए गए दूध की धार दी जाती है l एक मान्यता के चलते गांव में आज भी कोई दो मंजिला मकान नहीं बनाता l गांव के अनेक परिवार जोधपुर व अन्य शहरो में बेस हुवे हैं l

राजनीती प्रभाव: राजनीती में गांव का प्रारम्भ से ही प्रभाव रहा है l रियासत काल में गांव के लोग जोधपुर राज्य के कहीं महत्वपूर्ण पदों पर रहे व विशेष प्रभाव रखते थे ल आजादी के बाद भी यह सक्रियता बनी रही l

चर्चित चेहरे :
1. नरपत राम बरवड़ राजस्थान सरकार में राजस्व मंत्री रहे l
2. गोपाल सिंह पूर्व प्रधान रहे l
3. नारायण सिंह चांपावत राजस्थान पुलिस में अधिकारी व "सद्दाम" के नाम से बहुत चर्चित रहे l
4. शिवदत्त सिंह मारवाड़ राजपूत सभा के अध्यक्ष रहे l

5. भवानी सिंह चांपावत जो इतिहासविद्व रहे ।


इस प्रकार गांव के लगभग प्रत्येक परिवार से एक सरकारी कर्मचारी मिल जायेगा l

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